यह तथ्य किसी भी संवेदनशील समाज के लिए गहरी पीड़ा और आत्ममंथन का विषय होना चाहिए कि हमारे देश में हर वर्ष लगभग चौदह हजार छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023 में 13,892 विद्यार्थियों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि उन असंख्य सपनों की करुण कथा है, जो तंत्र की संवेदनहीनता, सामाजिक दबाव और शिक्षा जगत की विफलताओं के तले दब गए। पिछले दस वर्षों में ऐसी आत्महत्याओं में 65 प्रतिशत की वृद्धि और 2019 की तुलना में 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी, इस संकट की गहराई को स्पष्ट करती है। पहली नजर में इन आत्मघातों के पीछे पढ़ाई का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं और असफलता का भय जैसे कारण दिखाई देते हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि हमारा शिक्षा तंत्र इतना असंवेदनशील क्यों हो गया है कि छात्रों को जीवन से भागने की नौबत आ जाती है? यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों को तलब कर इस भयावह स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। न्यायालय ने पूछा है कि क्या देश के शिक्षण संस्थान छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं या नहीं। आज शिक्षा संस्थान 'ज्ञान के मंदिरÓ के बजाए 'प्रतिस्पर्धा के युद्धक्षेत्रÓ बन गए हैं। मोटी पगार वाली नौकरियों की होड़ में शिक्षकों और प्रबंधन ने वह मानवीय जिम्मेदारी भुला दी है, जिसके तहत उन्हें विद्यार्थियों को केवल विषयगत ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव से जूझने की क्षमता भी सिखानी थी। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ डिग्री देना नहीं, बल्कि संवेदनशील, आत्मविश्वासी और सहनशील नागरिक तैयार करना है, परंतु आज का तंत्र विद्यार्थियों में इन गुणों को विकसित करने में असफल हो रहा है। आखिर क्या कारण है कि एक परिवार की उम्मीद एक छात्र इतना टूट जाता है कि उसे मृत्यु ही मुक्ति का साधन लगती है? शिक्षण परिसरों में बढ़ती हिंसा, भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और असमानता की खबरें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि हमारे संस्थान अब विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित आश्रय नहीं रह गए हैं। हिंदी माध्यम के छात्र उच्च शिक्षा संस्थानों में अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के बीच खुद को कमतर महसूस करते हैं। उनकी ऊर्जा विषय के ज्ञान से अधिक भाषा की खाई पाटने में खर्च हो जाती है। परिणामस्वरूप, वे धीरे-धीरे हीनग्रंथि और आत्मग्लानि का शिकार हो जाते हैं। यह असमानता केवल भाषा की नहीं, बल्कि अवसरों और आत्मसम्मान की भी है। शिक्षण संस्थानों को यह समझना होगा कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ अंकों की दौड़ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाना है। उन्हें अपने परिसरों में ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जहां समता, सहानुभूति और सहजता का माहौल हो। जहां किसी छात्र को जाति, भाषा या आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण हीन महसूस न करना पड़े। इसके लिए प्रभावी मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र, प्रशिक्षित काउंसलर, और मजबूत शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना जरूरी है। दुर्भाग्य से हमारे नीति-निर्माता इस त्रासदी को केवल घोषणाओं और समितियों तक सीमित रख देते हैं। नीतियां बनती हैं, लेकिन उनका असर जमीनी स्तर पर नहीं दिखता। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय को सख्त रुख अपनाना पड़ा और केंद्र तथा राज्य सरकारों को आठ सप्ताह में आत्महत्या रोकथाम के दिशा-निर्देशों पर रिपोर्ट देने का आदेश देना पड़ा। यह स्थिति केवल छात्रों की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की असफलता है। जब देश का युवा वर्ग- जो भविष्य की नींव है, हताशा में आत्मघात कर रहा है, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकट है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि मानसिक स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं, बल्कि शिक्षा का अभिन्न अंग है। जरूरत इस बात की है कि शिक्षा नीतियों को प्रतिस्पर्धा से निकालकर संवेदनशीलता के दायरे में लाया जाए। स्कूलों और विश्वविद्यालयों को ऐसे स्थान बनाना होगा जहां विद्यार्थी केवल अंकों से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सहानुभूति से मापे जाएं। तभी हम उन असंख्य दीपों को बचा पाएंगे, जो आज तनाव और निराशा की आंधी में बुझ रहे हैं।
तनाव की फसल