अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से रूसी तेल कंपनियों लुकऑयल और रोजनेफ्ट पर लगाए गए ताजा प्रतिबंधों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई उथल-पुथल पैदा कर दी है। इन कदमों का सीधा असर भारत जैसे उभरते ऊर्जा उपभोक्ता देश पर पड़ना तय है,जिसने पिछले तीन वर्षों में अपनी तेल नीति को काफी हद तक रूसी आयात पर टिका लिया था। ट्रंप प्रशासन की घोषणा के बाद अब भारतीय तेल रिफाइनरियों, बैंकिंग संस्थानों और शिपिंग कंपनियों पर द्वितीयक प्रतिबंधों का खतरा मंडरा रहा है। यदि वे 21 नवंबर तक रूसी कंपनियों से अपने कारोबारी रिश्ते खत्म नहीं करतीं तो उन पर भी अमरीकी दंडात्मक कार्रवाई की संभावना है। यह स्थिति भारत के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन का भी सवाल बन गई है। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने भारी छूट पर रूसी कच्चा तेल खरीदकर अरबों डॉलर की बचत की थी। इस कदम ने जहां घरेलू मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में मदद की, वहीं भारत को वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच एक स्थिर उपभोक्ता अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन अब ट्रंप के प्रतिबंधों ने उस समीकरण को चुनौती दी है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर हमेशा गर्व रहा है- न तो रूस से पूर्ण निर्भरता और न ही अमरीका की ओर झुकाव। लेकिन इस बार समीकरण कहीं अधिक जटिल हैं। एक ओर अमरीका के साथ संभावित व्यापार समझौते और आर्थिक साझेदारी के नए अवसर हैं तो दूसरी ओर सस्ते रूसी तेल का लुभावना विकल्प। रिलायंस इंडस्ट्री जैसी कंपनियां पहले से संकेत दे रही हैं कि वे रोजनेफ्ट से अपनी खरीदारी घटा सकती हैं। वहीं, मध्य पूर्व विशेषकर इराक, सऊदी अरब और यूएई-से आयात में तेज बढ़ोतरी इसका स्पष्ट संकेत है कि भारत पहले से ही अपनी ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। यह बदलाव आसान नहीं होगा। सस्ते रूसी तेल से हटने का मतलब है बढ़ती ईंधन कीमतें, जो भारत के सात प्रतिशत विकास लक्ष्य पर दबाव डाल सकती हैं, किंतु भारत की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत है कि वह इन झटकों को झेल सके। 700 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार और तीव्र गति से बदलती व्यापारिक साझेदारियों के सहारे भारत यह साबित कर रहा है कि वह न केवल ऊर्जा के मोर्चे पर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है,बल्कि हर संकट को अवसर में बदलने की क्षमता भी रखता है। अमरीका का उद्देश्य रूस की युद्ध मशीन को आर्थिक रूप से कमजोर करना है। यह नैतिक रूप से उचित हो सकता है, लेकिन इसके वैश्विक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि रूसी तेल बाजार से गायब हो जाता है तो कीमतें आसमान छू सकती हैं, जो अमरीका और यूरोप दोनों के लिए राजनीतिक रूप से अस्थिर स्थिति पैदा करेगी। भारत का लक्ष्य स्पष्ट है-ऊर्जा सुरक्षा के साथ रणनीतिक लचीलापन बनाए रखना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार समझती है कि ऊर्जा नीति अब सिर्फ आर्थिक विषय नहीं रही, बल्कि विदेश नीति का प्रमुख स्तंभ बन चुकी है। इसलिए भारत न तो किसी एक ध्रुव के साथ पूरी तरह खड़ा हो सकता है,न ही अपनी विकास दर को राजनीतिक दबाव के हवाले कर सकता है। भविष्य का रास्ता कठिन जरूर है, परंतु असंभव नहीं। भारत को अपने ऊर्जा साझेदारी नेटवर्क को अमरीका, खाड़ी देशों, अफ्रीका और लैटिन अमरीका सभी के साथ और विस्तारित करना होगा । साथ ही दीर्घकालिक रणनीति में हरित ऊर्जा और वैकल्पिक स्रोतों पर निवेश को प्राथमिकता देनी होगी। इस समय भारत के सामने परीक्षा है -क्या वह सस्ती ऊर्जा के आकर्षण और वैश्विक दबावों के बीच अपनी स्वतंत्र नीति को बनाए रख पाएगा? इतिहास गवाह है कि भारत ने हर संकट से सीख ली है और अपने हितों की रक्षा की है। यह भी वैसी ही घड़ी है, जहां भारत की ऊर्जा रणनीति उसकी कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है।
अनावश्यक दबाव