भारत की आपत्ति

संयुक्त राष्ट्र में म्यामां पर हाल ही में प्रस्तुत मानवाधिकार रिपोर्ट को लेकर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा सांसद दिलीप सैकिया ने इस रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण और सांप्रदायिक बताते हुए स्पष्ट कहा कि इसमें भारत की छवि को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में मंगलवार को म्यामां की स्थिति पर संवाद सत्र आयोजित किया गया था। इस दौरान लोकसभा सांसद दिलीप सैकिया ने भारत का पक्ष रखा। रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत में रह रहे रोहिंग्या प्रवासियों की स्थिति और अधिक खराब हुई है। भारत ने इस आरोप को  तथ्यहीन और पूर्वाग्रह से प्रेरित बताया है। यह विवाद संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों के विशेष दूत थॉमस एंड्रयूज की उस रिपोर्ट से शुरू हुआ, जिसमें कहा गया कि पहलगाम हमले का असर भारत में रह रहे म्यांमार के शरणार्थियों पर पड़ा है। एंड्रयूज ने यहां तक कहा कि हमले में म्यामां का कोई व्यक्ति शामिल नहीं था, फिर भी रोहिंग्या प्रवासी दबाव में हैं। रिपोर्ट में धार्मिक कोण जोड़ते हुए उन्होंने यह भी कहा कि यह हमला हिंदू पर्यटकों पर हुआ था, जबकि हमलावर गैर-मुसलमानों को निशाना बनाना चाहते थे और उनके पीड़ितों में एक ईसाई भी शामिल था। भारत ने इसे सांप्रदायिक दृष्टिकोण से प्रेरित बयान बताते हुए कड़ा विरोध किया। सैकिया ने स्पष्ट किया कि भारत में सभी धर्मों के लोग समान अधिकारों के साथ रहते हैं और यहां 20 करोड़ से अधिक मुसलमान भारत के विकास में सक्रिय भागीदार हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के दूत से आग्रह किया कि वे असत्यापित मीडिया रिपोर्टों पर भरोसा करने के बजाय तथ्यों की स्वतंत्र और संतुलित जांच करें। भारत का यह तर्क वाजिब है कि किसी आतंकी हमले को किसी समुदाय विशेष या प्रवासी समूह से जोड़ना अनुचित है, विशेषकर जब कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य न हो। भारत का रुख इस मामले में दोहरा नहीं रहा है। म्यामां में जारी संकट पर भारत लगातार हिंसा की समाप्ति, राजनीतिक संवाद और लोकतांत्रिक बहाली की मांग करता रहा है। उसने यह भी दोहराया है कि मानवीय सहायता का निर्बाध प्रवाह और सभी पक्षों की भागीदारी से ही म्यामां में स्थायी शांति संभव है। भारत न केवल म्यामां के लोकतांत्रिक परिदृश्य का समर्थक है, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखने के लिए भी प्रतिबद्ध है। रोहिंग्या संकट की शुरूआत 2017 में हुई, जब म्यामां के रखाइन प्रांत में अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी ने सुरक्षा चौकियों पर हमला किया था। उसके बाद म्यामां की सेना की हिंसक कार्रवाई से लाखों रोहिंग्या विस्थापित हुए और पड़ोसी देशों की ओर पलायन करने लगे। भारत ने इन शरणार्थियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाया, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया कि इनके बीच कुछ तत्व कट्टरपंथी संगठनों से प्रभावित हैं, जिससे सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की चुनौती बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूतों का काम स्वतंत्र जांच और निष्पक्ष रिपोर्टिंग करना होता है, लेकिन जब उनका आकलन राजनीतिक या सांप्रदायिक झुकाव से प्रभावित दिखे, तो उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। भारत का यह कहना सही है कि ऐसी रिपोर्टें तथ्यपरक होनी चाहिए, न कि मीडिया या सीमित स्रोतों पर आधारित। म्यामां संकट जटिल है- यह न केवल एक मानवीय त्रासदी है, बल्कि दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है। ऐसे में किसी भी पक्ष द्वारा संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाना समाधान नहीं, बल्कि विभाजन को और गहरा करेगा। भारत का यह आग्रह कि शांति केवल समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया से संभव है, न केवल तर्कसंगत बल्कि क्षेत्रीय हितों के अनुरूप भी है। संयुक्त राष्ट्र को भी चाहिए कि वह ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर तथ्यों की ठोस पड़ताल करे और सभी पक्षों की आवाज समान रूप से सुने- तभी म्यामां और उसके शरणार्थियों के लिए स्थायी समाधान की दिशा में वास्तविक प्रगति संभव होगी।