बिहार विधानसभा चुनाव-2025 का पहला चरण 6 नवंबर को होना है, जिसमें 18 जिलों की 121 सीटों पर मतदान होगा। 1,314 उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन चर्चा सबसे ज्यादा बागियों की हो रही है, वे उम्मीदवार जो टिकट न मिलने या नेतृत्व से नाराज होकर अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस बार बागियों की संख्या एनडीए में महागठबंधन से ज्यादा है, जिससे सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए समीकरण और पेचीदा बन गए हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि बिहार की राजनीति में बागी प्रत्याशियों का असर अक्सर निर्णायक रहा है। 2020 के चुनाव में कम-से-कम 11 सीटों पर जीत-हार का अंतर एक हजार वोटों से भी कम था, जबकि कई सीटों पर बागी उम्मीदवारों ने 40 से 50 हजार तक वोट काटकर पूरे समीकरण को पलट दिया था। उस चुनाव में एनडीए के 19 और महागठबंधन के 10 प्रत्याशी बागियों की वजह से तीसरे स्थान पर पहुंच गए थे। इस बार भी दोनों ही गठबंधनों में तीन दर्जन से अधिक बागी मैदान में हैं। एनडीए में बीजेपी, जेडीयू, एलजेपी (रामविलास), हम और आरएलएसपी शामिल हैं, जबकि महागठबंधन में आरजेडी, कांग्रेस, वाम दल और वीआईपी जैसी पार्टियां हैं। दोनों ही खेमों में टिकट बंटवारे के बाद असंतोष फूट पड़ा। कई नेताओं ने निर्दलीय बनकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। ऐसे में एनडीए ने डैमेज कंट्रोल की व्यापक कवायद शुरू की है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का हालिया बिहार दौरा इसी रणनीति का हिस्सा था। उन्होंने पटना में देर रात तक बैठकों का दौर चलाया और बागियों को मनाने का जिम्मा अपने विश्वस्त नेताओं को सौंपा। परिणामस्वरूप कई सीटों पर बागी उम्मीदवारों ने नाम वापस ले लिये। हायाघाट से रमेश चौधरी, राजनगर से डॉ. रामप्रीत पासवान, नरकटियागंज से रश्मि वर्मा और बेतिया से प्रकाश राय जैसे कई नेताओं ने अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद नाम वापस ले लिया। वहीं तारापुर में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को राहत मिली जब निषाद समाज के सकलदेव सिंह ने नाम वापस लेकर बीजेपी को समर्थन दे दिया। माना जा रहा है कि इस कदम से सम्राट चौधरी को ईबीसी मतों का लगभग 15,000 वोट का लाभ मिलेगा। दूसरी ओर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को बड़ा झटका लगा है। उनके तीन प्रत्याशी- गोपालगंज, ब्रह्मपुर और दानापुर से- नामांकन वापसी या न करने की वजह से बाहर हो गए। प्रशांत किशोर ने बीजेपी पर अपने प्रत्याशियों को दबाव में लाने का आरोप लगाया और अमित शाह के साथ जन सुराज प्रत्याशी की तस्वीर तक सार्वजनिक की। यह घटनाक्रम बिहार में चुनावी रणनीति के मैनेजमेंट पक्ष को उजागर करता है। महागठबंधन में भी सब कुछ सुचारु नहीं है। तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने और मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का दावा सौंपने के बावजूद घटक दलों के बीच नौ सीटों पर फ्रेंडली फाइट तय मानी जा रही है। कांग्रेस में असंतोष खुलकर सामने आया, हालांकि नेतृत्व ने भागलपुर और वारसलीगंज जैसी सीटों पर असंतुष्ट उम्मीदवारों को मना लिया। बिहार में राजनीति जातीय समीकरणों, स्थानीय असंतोष और व्यक्तित्व आधारित वोटिंग के मिश्रण पर टिकी रहती है। ऐसे में बागियों का प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक होगा। एनडीए के लिए यह चुनाव केवल सत्ता बचाने का नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता साबित करने की भी परीक्षा है। वहीं महागठबंधन के सामने चुनौती यह है कि वह साझा नेतृत्व और सीट बंटवारे को लेकर संदेश में स्पष्टता बनाए रखे। बागी उम्मीदवार लोकतंत्र में असंतोष की अभिव्यक्ति का प्रतीक हैं, लेकिन जब उनका उद्देश्य केवल सत्ता समीकरण बिगाड़ना रह जाए  तो यह जनादेश की शुद्धता पर प्रश्नचिन्ह छोड़ जाता है। इस चुनाव में बिहार के मतदाताओं की सबसे बड़ी भूमिका यही होगी कि वे तय करे, क्या वे नाराज बागियों के साथ खड़े होंगे, या स्थिर शासन के पक्ष में मतदान करेंगे। बिहार की राजनीति का यह चरण केवल चुनाव नहीं, बल्कि दलगत अनुशासन और राजनीतिक नैतिकता की भी परीक्षा है। छह नवंबर का मतदान यह तय करेगा कि आखिर किसका गणित सही बैठा - बागियों का या गठबंधनों का।