कोलकाता एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर इन दिनों मूसलाधार बारिश के कारण बुरी तरह प्रभावित है। बीते मंगलवार से लगातार हो रही भारी बारिश ने न सिर्फ शहर की रफ्तार को थाम दिया,बल्कि प्रशासनिक तैयारियों की भी सच्चाई उजागर कर दी। दुर्गा पूजा जैसे बड़े और उल्लासपूर्ण पर्व के दौरान इस तरह की विपदा ने श्रद्धालुओं और आम नागरिकों को गहरी परेशानी में डाल दिया है। पिछले 24 घंटों में 251.4 मिमी बारिश ने 1986 के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है। इससे दक्षिण और पूर्वी कोलकाता सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। सडकों पर पानी का सैलाब है, घरों में पानी घुस चुका है और पूरा शहर थम गया है। सबसे दुखद बात यह है कि अब तक इस आपदा में 10 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें 9 लोगों की मौत बिजली के करंट से हुई। यह हमारे शहरी बुनियादी ढांचे की भयावह स्थिति को दर्शाता है। कोलकाता का नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा जो पूर्वी भारत के सबसे व्यस्ततम हवाई अड्डों में से एक है, पूरी तरह प्रभावित हुआ। खराब मौसम के चलते 42 आने वाली और 49 जाने वाली उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। इसके अलावा 90 से अधिक उड़ानों में देरी हुई। यह न सिर्फ यात्रियों के लिए परेशानी का सबब बना,बल्कि इससे आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा। इसी तरह मेट्रो और रेल सेवाएं भी बुरी तरह प्रभावित हुईं। पूर्वी रेलवे के सियालदह दक्षिण खंड पर परिचालन बंद कर दिया गया है और सर्कुलर रेलवे की पटरियां पानी में डूबी हुई हैं। कई स्थानों पर मेट्रो स्टेशनों में पानी भर गया,जिससे यात्रियों की सुरक्षा के लिए सेवाएं अस्थायी रूप से रोकनी पड़ीं। बारिश की भविष्यवाणी पहले से की जा चुकी थी। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने बंगाल की खाड़ी में बने निम्न दबाव के क्षेत्र को लेकर चेतावनी जारी की थी। इसके बावजूद, कोलकाता नगर निगम और राज्य सरकार की ओर से किए गए दावे धरातल पर कहीं नजर नहीं आए। जल निकासी की तैयारियां बेहद कमजोर साबित हुईं। बालीगंज, गरिया, कस्बा, टॉलीगंज, बेहाला जैसे इलाकों में सड़कों पर कमरभर पानी जमा है। कई वाहन बंद हो गए हैं और सैकड़ों लोग फंसे हुए हैं। कोलकाता म्युनिसिपल कारपोरेशन हर साल मानसून से पहले जल निकासी के लिए बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन जब भी मूसलाधार बारिश होती है, वही पुराने दृश्य सामने आते हैं। सड़कों पर नाव चलती हैं, घरों में पानी भर जाता है और बिजली गुल हो जाती है। इस बार भी वही हुआ और प्रशासन एक बार फिर असहाय नजर आया। दुर्गा पूजा बंगाल के लोगों का सबसे बड़ा पर्व है, जिसकी तैयारियां महीनों पहले से शुरू हो जाती हैं। इस बार पंडालों में पानी भर जाने से भक्तों को भारी परेशानी उठानी पड़ी है। कई स्थानों पर पूजा स्थलों तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया। प्रशासन ने स्कूल बंद कर दिए हैं और छुट्टियां पहले घोषित कर दी गई हैं, लेकिन यह निर्णय तब लिया गया जब हालात बिगड़ चुके थे। यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि क्या हर बार की तरह इस बार भी प्रशासन केवल क्षति नियंत्रण और मुआवजे तक सीमित रहेगा या कोई दीर्घकालिक योजना बनेगी? क्या जल निकासी प्रणाली को आधुनिक बनाने पर गंभीरता से विचार होगा? क्या बिजली के तारों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी? क्या बारिश के समय ट्रैफिक और आपात सेवाओं को बेहतर समन्वय के साथ चलाने के लिए कोई सशक्त योजना बनेगी? राज्य सरकार और नगर निगम को यह समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसे चरम मौसमी घटनाएं अब सामान्य होती जा रही हैं। इसके लिए शहरी संरचना और आपदा प्रबंधन को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। कोलकाता एक जीवंत और जुझारू शहर है, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी बारिश के आगे उसकी व्यवस्था घुटनों पर नजर आई। मूसलाधार बारिश को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उससे निपटने की तैयारी की जा सकती है। अगर इस आपदा से सबक लेकर भविष्य की ठोस योजना बनाई जाए तो शायद अगली बार कोई मां-बाप अपने बच्चे को करंट लगने से खोने से बचा सके। अगर कुछ सीखा नहीं गया तो यह जलप्रलय हर साल लौटेगा और हर बार कुछ अनमोल जानें ले जाएगा।
डूबा कोलकाता