कभी-कभी समय कुछ ऐसा कर जाता है जिसे समझना और स्वीकार करना दोनों ही असंभव हो जाता है। असम के बहुआयामी कलाकार और देश के प्रसिद्ध गायक जुबिन गर्ग का यूं असमय जाना पूरे देश को स्तब्ध कर गया है। एक रॉकस्टार, संगीतकार, अभिनेता, निर्देशक और परोपकारी के रूप में अपनी छवि गढ़ने वाले जुबिन गर्ग अब हमारे बीच नहीं रहे। 19 सितंबर, 2025 को सिंगापुर में एक स्कूबा डाइविंग दुर्घटना में उनका निधन हो गया। वे महज 52 वर्ष के थे। यह विडंबना ही है कि जब असम भूपेन हजारिका का शताब्दी वर्ष मना रहा है, उसी दौरान जुबिन गर्ग जैसे लोकप्रिय और जनप्रिय कलाकार का निधन हो गया। उनकी यह असमय मृत्यु न केवल असमवासियों के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है। जुबिन का जन्म 18 नवंबर 1972 को मेघालय के तुरा में हुआ था। उन्होंने अपने संगीत सफर की शुरुआत असमिया एल्बम अनामिका से की थी। अपने करियर में उन्होंने असमिया, हिंदी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, उडिया, नेपाली, मलयालम और मराठी जैसी कई भाषाओं में गीत गाए। या अली जैसे सुपरहिट गाने ने उन्हें हिंदी सिनेमा में एक नई पहचान दी, लेकिन जुबिन सिर्फ एक गायक नहीं थे,वे एक संपूर्ण कलाकार थे—संगीतकार, निर्देशक, अभिनेता और लेखक, जो हर कला को अपने भीतर समेटे हुए थे। उनकी संगीत शैली में असमिया लोकधुनों की मिठास और आधुनिक बीट्स का संयोजन था। वे कीबोर्ड, गिटार, तबला जैसे कई वाद्ययंत्रों में दक्ष थे। उन्होंने न केवल संगीत रचा,बल्कि असमिया संस्कृति को देश-विदेश में पहचान दिलाई। उनकी मृत्यु की परिस्थितियां भी उतनी ही पीड़ादायक हैं। नॉर्थ ईस्ट इंडिया फेस्टिवल में प्रस्तुति देने के लिए सिंगापुर पहुंचे जुबिन स्कूबा डाइविंग के दौरान दुर्घटना के शिकार हो गए। बताया गया कि उन्होंने लाइफ जैकेट हटा दी थी, जिससे उन्हें सांस लेने में परेशानी हुई। तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें नहीं बचाया जा सका। असम सरकार ने उनके निधन पर तीन दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की है। पूरे राज्य में स्वत: बंद जैसा माहौल रहा। उनके प्रशंसकों ने श्रद्धांजलि देते हुए मोमबत्तियां और दीये जलाए। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से लेकर विपक्ष के नेता तक ने उनके निधन पर गहरा शोक प्रकट किया है। जुबिन गर्ग केवल एक कलाकार नहीं थे, वे एक भावना थे, जो हर दिल में घर कर चुके थे। उनकी आवाज, उनकी रचनाएं और उनका व्यक्तित्व सदा जीवित रहेंगे। उनका जाना एक ऐसे खालीपन को जन्म देता है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा। वे असम के सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक थे और उनके बिना यह धरोहर अधूरी-सी लगती है। आज हर जुबिन प्रेमी की जुबां पर बस एक ही सवाल है - जुबिन, तुम क्यों चले गए? पर नियति के आगे किसका बस चलता है। हम केवल यही कह सकते हैं — जुबिन, आप नहीं हैं, पर आपकी आवाज हमेशा हमारे साथ रहेगी। आमतौर पर मृत्यु शाश्वत है। हर किसी को इस दुनिया से कूच करना है। उर्दू के मशहूर शायर मिर्जा गालिब ने कहा है कि मृत्यु का समय निश्चित है। संत कबीर ने भी कहा था कि मनुष्य को पता नहीं होता कि वह कब और कहां मृत्यु को वरण करेगा। फिर भी कुछ मौत ऐसी होती हैं जिसे आम लोग स्वीकार नहीं करते। यदि मौत आम लोगों की भाषा में आकाल हो तो लोगों की ङ्क्षचताएं और बढ़ जाती है। दुख का सैलाब बहने लगता है। लोग आंसू बहाने को मजबूर हो जाते हैं। जुबिन गर्ग की मौत से पूरे राज्य में मातम का माहौल है। उनकी मृत्यु के एक दिन बाद राज्य भर में बंद देखा गया। हाट-बाजार से घर तक लोग खामोश दिखे। उल्लेखनीय है कि कलाकार कभी नहीं मरते। वे अपनी कला के साथ सदैव जीवित रहते है, जो उन्हें अमरत्व प्रदान करता है।
आवाज रहेगी अमर