चिर स्मरणीय रहेंगे जी.एल. अग्रवाला
वशिष्ठ नारायण पांडेय
अच्छे इंसान कभी नहीं मरते। वे भले ही अपने शरीर से मुक्त हो जाते हैं, लेकिन उनकी यादें, उनके विचार और उनके द्वारा किए गए कार्य सदैव जीवित रहते हैं। वे हमारे हृदय और मस्तिष्क में हमेशा बसे रहते हैं, हमारी प्रेरणा बनकर। आज हम जीएल पब्लिकेशंस लिमिटेड के संस्थापक, पूर्व अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक (सीएमडी) और 'पूर्वांचल प्रहरीÓ के संस्थापक संपादक स्वर्गीय श्री जी. एल. अग्रवाला जी की 86वीं जयंती पर उन्हें सादर स्मरण कर रहे हैं। जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब उनका व्यक्तित्व और उनके कार्य और भी अधिक भव्य रूप में हमारे सामने उभरकर आते हैं। ऐसी शख्सियतें बार-बार जन्म नहीं लेतीं। वे एक अवतारी पुरुष थे, जिन्होंने अपने जीवन को मानव सेवा, पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक समर्पण के लिए समर्पित कर दिया। बरपेटा रोड जैसे छोटे नगर से निकलकर अमरीका के व्हाइट हाउस तक की यात्रा करने वाले श्री अग्रवाला जी ने यह सिद्ध कर दिखाया कि दूरदृष्टि, संकल्प और मेहनत से कोई भी ऊंचाई प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाजसेवा का माध्यम बनाया। उनके नेतृत्व में बिताए गए अनगिनत क्षण आज भी हमारी स्मृतियों में जीवंत हैं।
जब भी संपादकीय टीम किसी विषय पर उलझ जाती, वे अपनी सहज और गूढ़ दृष्टि से कठिन से कठिन समस्याओं का समाधान पल भर में निकाल देते थे। उन्होंने हमें सिखाया कि पत्रकारिता निष्पक्ष, निर्भीक और समाज के प्रति उत्तरदायी होनी चाहिए। 'पूर्वांचल प्रहरीÓ का नारा- हम ईश्वर के सिवा किसी से नहीं डरते- उनके इसी साहसी और निर्भीक व्यक्तित्व का परिचायक था। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी वे सामाजिक और पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय रहे। उनका जीवन संघर्ष और सेवा की मिसाल बन चुका है। जीएलपी सोशल सर्किल के माध्यम से वे लगातार मानव सेवा और असम की साहित्यिक-सांस्कृतिक उन्नति के लिए कार्य करते रहे। उनके प्रयासों से असमिया और हिंदी समाज के बीच एक पुल निर्मित हुआ। उनके कार्यों में धर्म, समाज, साहित्य, स्वास्थ्य सेवा और सांप्रदायिक सद्भाव जैसे क्षेत्र शामिल थे। भूतनाथ श्मशान घाट का कायाकल्प हो या लाचित नगर हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार, असमिया भागवत का नि:शुल्क वितरण हो या शंकरदेव-माधवदेव की परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प- हर पहलु में उनका योगदान अमूल्य है। उन्होंने असम साहित्य सभा द्वारा आयोजित अधिवेशनों में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई और हिंदी के साथ-साथ असमिया भाषा के प्रचार-प्रसार में भी अपना जीवन लगा दिया। 'जोनाकीÓ जैसी ऐतिहासिक पत्रिका के पुनर्प्रकाशन और असमिया विश्वकोश के निर्माण में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी - मानवता के प्रति अटूट समर्पण और कर्म के प्रति निष्कलंक निष्ठा। वे हर कर्मचारी को नाम से जानते थे, हर पाठक की अपेक्षा को समझते थे और हर सामाजिक पीड़ा को अपनी पीड़ा मानते थे। आज जब हम उनकी जयंती पर उन्हें याद कर रहे हैं, तो आंखें नम हो जाती हैं और दिल गर्व से भर जाता है कि हमें उनके साथ काम करने,उनसे सीखने और उनके मार्गदर्शन में आगे बढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वे अब भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी सोच, उनके मूल्य और उनके कार्य हमेशा हमारे साथ रहेंगे।
उनकी यादें अमर हैं। उनका योगदान अमूल्य है
और उनका जीवन हम सबके लिए एक प्रेरणा है
स्वर्गीय श्री जी.एल. अग्रवाला जी को उनकी जयंती पर
भावभीनी श्रद्धांजलि