प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जून 2023 में अमरीका दौरा ऐतिहासिक माना गया था। वाशिंगटन की सड़कों पर उनका भव्य स्वागत, व्हाइट हाउस में आयोजित राजकीय भो और तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन की ओर से दिए गए गर्मजोशी भरे शब्द इस बात के प्रतीक थे कि अमरीका भारत को 21वीं सदी का एक निर्णायक साझेदार मानता है। लेकिन एक साल भी नहीं बीता और हालात नाटकीय रूप से बदल चुके हैं। 2025 की शुरुआत में जब प्रधानमंत्री मोदी, अमरीका के नए राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से मिलने वाइट हाउस पहुंचे तो पिछली बार की भव्यता नदारद थी। हालांकि दोनों नेताओं ने मुस्कराते हुए हाथ मिलाए, लेकिन तस्वीरों के पीछे की हकीकत कुछ और थी—व्यापारिक टकराव और कूटनीतिक खींचतान। 27 अगस्त से अमरीकी बाजार में जाने वाले अधिकांश भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाया गया, जो वैश्विक स्तर पर सबसे ऊंची दरों में से एक है। यह ट्रंप की उस नीति का हिस्सा है जिसमें वे व्यापारिक साझेदारों पर अमरीका प्रथम के नाम पर दबाव बना रहे हैं। भारतीय वस्त्र, आभूषण और रत्न क्षेत्र इससे बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अनुसार इन क्षेत्रों में भारी निर्यात गिरावट से लाखों नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है।
ट्रंप प्रशासन की नजर में भारत का रूस से तेल खरीदना एक बड़ा अवरोध रहा। इसके चलते भारत पर 25 अतिरिक्त शुल्क भी लगा दिया गया। इसके अलावा भारत-पाक संघर्ष और बाद में हुए युद्धविराम में ट्रंप की कथित भूमिका को लेकर भी दोनों देशों की व्याख्याओं में फर्क सामने आया है। जहां ट्रंप इसे अपनी कूटनीतिक सफलता बता रहे हैं, वहीं मोदी इसे भारतीय दबाव की जीत मानते हैं। इस मतभेद ने संबंधों की खटास और बढ़ा दी है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत को अमेरिका की तुलना में इस व्यापार युद्ध में बड़ा नुकसान हो रहा है। 2024 में भारत ने अमेरिका को 87 अरब डॉलर मूल्य का निर्यात किया, जो 2026 तक घटकर 50 अरब डॉलर पर पहुंच सकता है। इसका सीधा असर 'मेक इन इंडियाÓ और 'वोकल फॉर लोकलÓ जैसी पहलों पर पड़ सकता है, जिन पर मोदी सरकार ने विशेष ध्यान दिया है। हालांकि, यह कहना भी गलत नहीं होगा कि भारत-अमेरिका संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक साझेदारी, तकनीकी सहयोग, और रक्षा समझौते—इन सभी में दोनों देशों का हित जुड़ा है। लेकिन अगर व्यापारिक मतभेद कूटनीतिक रिश्तों को नुकसान पहुंचाते हैं, तो इसका असर व्यापक हो सकता है। सीएसआईएस के विशेषज्ञ रिक रॉसो का मानना है कि भारत का संरक्षणवाद ट्रंप के निशाने पर है, लेकिन उनकी रणनीति अत्यधिक कठोर और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। मोदी सरकार के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती बन गई है—एक ओर अमेरिका का दबाव, दूसरी ओर घरेलू राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की मजबूरी। अब यह देखना अहम होगा कि भारत इस संकट से किस तरह निपटता है। क्या वह अमेरिका के साथ नए सिरे से बातचीत की पहल करेगा? या फिर वह अपनी आर्थिक रणनीति में विविधता लाकर नए साझेदारों की तलाश करेगा? भारत-अमरीका संबंधों की यह अग्निपरीक्षा केवल दो नेताओं की विचारधारा की नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति की दिशा तय करने वाली परीक्षा भी है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि क्या दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र एक साझा राह पर आगे बढ़ेंगे, या फिर अपने-अपने राष्ट्रहित में एक-दूसरे से दूर होते जाएंगे।