प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया चीन दौरा और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) समिट में उनकी भागीदारी को लेकर देश में चर्चाओं का दौर थमा नहीं है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई वह वीडियो, जिसमें मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हंसते-बतियाते नजर आ रहे हैं ने भारत, चीन और रूस के संभावित समीकरणों को लेकर नई अटकलों को जन्म दे दिया है। लेकिन क्या वास्तव में हम एक नई शुरुआत की ओर बढ़ रहे हैं, या यह सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार की एक झलक है? भारत और चीन के बीच रिश्ते केवल कैमरों की मुस्कान से तय नहीं होते। गलवान संघर्ष के बाद उपजे अविश्वास की खाई अभी पूरी तरह नहीं पटी है। विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि यह दौरा द्विपक्षीय नहीं था, बल्कि एक बहुपक्षीय मंच की भागीदारी थी। यही तथ्य बताता है कि संबंध अभी भी सामान्य नहीं हुए हैं, लेकिन एक संवाद की शुरुआत जरूर हुई है। मोदी का चीन जाना और शी जिनपिंग से मुलाकात करना, अपने आप में एक संकेत है-बर्फ पिघल रही है। परंतु यह कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों देशों के रिश्तों में गर्माहट आ गई है। यह तो महज एक राजनीतिक अभिनय है, असली पटकथा अब भी लिखी जानी बाकी है। कुछ विश्लेषक यह मानते हैं कि अमरीका, विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीतियों ने भारत को चीन के करीब जाने के लिए मजबूर किया। लेकिन यह तर्क सतही है। भारत और चीन ने पिछले वर्ष ही संबंध सुधारने की मंशा जाहिर कर दी थी। सीमा विवादों को सुलझाने के लिए कई कूटनीतिक प्रयास किए गए हैं और संवाद के दरवाजे अभी भी खुले हैं। भारत अब उस स्थिति में नहीं है कि वह किसी एक देश पर भरोसा करके अपनी विदेश नीति तय करे-चाहे वह अमरीका हो, रूस हो या चीन। बीते वर्षों के अनुभवों ने सिखाया है कि अति विश्वास विदेश नीति में आत्मघाती साबित हो सकता है। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने पीएम मोदी की चीन यात्रा पर सवाल उठाए हैं, खासतौर पर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन-पाक जुगलबंदी का मुद्दा न उठाने पर। यह आलोचना लोकतंत्र की परंपरा का हिस्सा है, लेकिन विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषय पर एक साझा दृष्टिकोण की आवश्यकता समय की मांग है। बहरहाल विशेषज्ञ मानते हैं कि विपक्ष की आलोचनाएं एक संदेश का काम भी करती हैं। चीन को यह अहसास कराना कि भारत में उसके प्रति कोई सर्वसम्मति नहीं है। यह भारत की कूटनीति का एक परोक्ष दबाव है, जिसे चीन को समझना होगा। इतिहास यह स्पष्ट करता है कि चीन एक भरोसेमंद साझेदार नहीं रहा है-चाहे वह व्यापार हो, निवेश हो या सीमा विवाद। भारत अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। यही वजह है कि कोई बड़ा समझौता नहीं हुआ, कोई नई शुरुआत की घोषणा नहीं हुई, सिर्फ शिष्टाचार, संवाद और संकेत दिए गए। इस दौर में भारत को एक व्यावहारिक नीति अपनानी होगी, जहां भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हितों को केंद्र में रखा जाए। हिंदी-चीनी भाई-भाई के पुराने नारे अब केवल स्मृति बन चुके हैं। अब वक्त है हिंदी-चीनी व्यापार-संवाद जैसे यथार्थवादी नारे की, जिसमें भरोसा नहीं है, उसमें संतुलन जरूरी है। प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा एक प्रतीक है संवाद के खुले दरवाजों का। लेकिन यह न तो दोस्ती का ऐलान है और न ही दुश्मनी का अंत। यह सिर्फ शुरुआत है, एक मौका है, जिसे दोनों देशों को गंभीरता से लेना होगा। भारत को अब तटस्थ रहकर अपनी विदेश नीति को संतुलित बनाना होगा, जहां अमरीका, रूस और चीन, तीनों के साथ कामकाजी रिश्ते बने रहें, लेकिन किसी एक पर निर्भरता न हो। चीन के साथ भरोसा तभी बनेगा जब वह बार-बार भारत की संवेदनशीलता को नजरंदाज करना बंद करेगा। भारत को सिर्फ संकेतों से नहीं, ठोस परिणामों से संतुष्ट होना चाहिए।
चीन कितना भरोसेमंद