तयानजिन में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात एक प्रतीकात्मक क्षण नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संवाद की अगली कड़ी है। ऐसा संवाद जो कोविड-19, गलवान संघर्ष और वैश्विक ध्रुवीकरण की छाया से निकलकर भविष्य की ओर देख रहा है। सात वर्षों में पहली बार प्रधानमंत्री मोदी चीन पहुंचे और वह भी ऐसे वक्त पर जब भारत और चीन दोनों ही पश्चिमी दबावों के बीच अपने-अपने रणनीतिक विकल्पों को पुन: परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। अमरीका भारत पर टैरिफ की चोट हो या चीन पर पश्चिमी निर्भरता कम करने की वैश्विक मुहिम- दोनों देशों के पास एक-दूसरे से संवाद बढ़ाने की वजहें अब सिर्फ द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक बन चुकी हैं। 2020 में गलवान घाटी की झड़पों के बाद दोनों देशों के रिश्ते लगभग शून्य पर आ गए थे। लेकिन अब, पांच साल बाद तस्वीर बदल रही है। मोदी और शी की यह दूसरी मुलाकात है, पिछली बार अक्तूबर 2024 में रूस के कजान में दोनों नेताओं ने साझा गश्त व्यवस्था पर सहमति जताकर बातचीत की संभावनाएं खोली थीं। तियानजिन में यह वार्ता उसी विश्वास-निर्माण प्रक्रिया का विस्तार है। बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता को रिश्तों की बुनियाद बताया तो राष्ट्रपति शी ने भारत-चीन कूटनीतिक संबंधों के 75वें वर्ष का हवाला देते हुए ड्रैगन और हाथी के साथ मिलकर नृत्य करने की बात कही। यह भाषा भले ही कूटनीतिक हो, लेकिन इसके पीछे रणनीतिक उद्देश्य स्पष्ट हैं- सहयोग, टकराव से बेहतर है। एक प्रमुख संकेत यह है कि सीमा पर तनाव कम हुआ है और विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा प्रबंधन को लेकर सहमति बनी है। कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली और भारत-चीन के बीच सीधी उड़ानों का दोबारा शुरू होना संकेत देता है कि दोनों देश न्यूनतम सामान्य संबंध की ओर लौटना चाहते हैं, भले ही गहन मैत्री अभी दूर हो। भारत और चीन के बीच 100 अरब डॉलर से अधिक व्यापार होता है पर व्यापार असंतुलन अब भी चीन के पक्ष में है। भारत चाहता है कि चीन भारतीय उत्पादों पर लगाई गई बाधाएं हटाए। वहीं, चीन ने हाल ही में भारत पर लगे खनिज, उर्वरक और मशीनरी निर्यात प्रतिबंधों को हटाकर सकारात्मक संकेत दिए हैं, लेकिन यह संतुलन सिर्फ आर्थिक नहीं है- भारत अब एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपने लिए स्वतंत्र जगह चाहता है। भारत एससीओ में चीन-रूस के साथ संवाद करता है तो क्वॉड जैसे मंचों से भी जुड़ा रहता है। यह रणनीतिक लचीलापन भारत की विदेश नीति की पहचान बन चुका है। अमरीका की ओर से भारत पर टैरिफ लगाना और रूस से कच्चा तेल खरीदने पर नाराजगी जताना कोई संयोग नहीं। यह भारत को रणनीतिक विकल्प चुनने पर बाध्य करने की कोशिश है, लेकिन चीन ने इस मौके पर भारत के पक्ष में खड़ा होकर साझे दबाव के खिलाफ साझे जवाब का संकेत दिया है। शंघाई सहयोग संगठन (एसएसओ) भारत के लिए एक ऐसा मंच है, जहां वह चीन और रूस से संवाद कर सकता है, बिना पश्चिमी गुटों से दूरी बनाए। यह गैर-संघर्ष संतुलन भारत की कूटनीतिक शैली का हिस्सा बन चुका है। हालांकि इसमें खतरे भी हैं- चीन और रूस का एजेंडा भारत के दीर्घकालिक हितों से मेल न भी खा सके। जानकार बताते हैं कि भारत और चीन लंबी और जटिल प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, जिसमें एक नया संतुलन स्थापित किया जा रहा है - न पूरी दोस्ती है, न पूरी दुश्मनी। तियानजिन की यह मुलाकात दोनों देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति को दोहराती है - टकराव की जगह संवाद, तनाव की जगह तालमेल, और संदेह की जगह स्थिरता। इस नए संतुलन की राह अभी कठिन है, लेकिन चलना तो पड़ेगा। कारण कि जब ड्रैगन और हाथी साथ नाचते हैं तो पूरा एशिया थिरकता है। ट्रंप की टैरिफ नीति के बाद पूरी दुनिया के शासनाध्यक्ष अपने-अपने देश की अर्थ-व्यवस्था को बचाये रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। ट्रंप की इस नीति के कारण पुराने दुश्मन अब दोस्त बनकर अमरीका की नीतियों का विरोध कर रहे हैं और एक-दूसरे के सहयोग का संकल्प ले रहे हैं। वैसे भारत और भारतवासी चीन पर कभी भरोसा नहीं करते, परंतु वर्तमान में कोई विकल्प नहीं है। इसलिए ये देश एक हो रहे हैं। ट्रंप की नीतियां यूरोप से एशिया तक के देशों के लिए खतरनाक है। इसलिए सभी साझा मंच बना-बनाकर अमरीका के खिलाफ एकजुटता दिखा रहे हैं।
रिश्ते ने ली नई करवट