गाजा में लगातार बढ़ते मानवीय संकट ने यूरोपीय संघ को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां न केवल उसकी एकजुटता की परीक्षा हो रही है, बल्कि उसकी अंतर्राष्ट्रीय भूमिका और कूटनीतिक प्रभाविता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की बैठक, जो हाल ही में कोपनहेगन में हुई,उस पर से पर्दा उठाते हुए यह स्पष्ट हो गया कि यूरोप इजरायल के खिलाफ कोई ठोस और समग्र कार्रवाई करने को तैयार नहीं है। यूरोपीय आयोग की ओर से इजरायल की कंपनियों के रिसर्च फंड पर रोक लगाने की सिफारिश की गई थी, लेकिन इससे संबंधित प्रस्ताव पर बहुमत जुटाने में संघ विफल रहा। इस घटनाक्रम ने यूरोपीय संघ के भीतर मौजूद गहरे राजनीतिक और रणनीतिक मतभेदों को उजागर कर दिया है। जर्मनी, यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा सदस्य और एक महत्वपूर्ण राजनयिक खिलाड़ी, इजरायल पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है। जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल का यह कहना कि प्रतिबंधों से गाजा में इजरायल के सैन्य अभियानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनकी नीति को स्पष्ट करता है। जर्मनी का तर्क यह है कि इस समय इजरायल पर प्रतिबंध लगाने की बजाय  हथियारों की आपूर्ति रोकने का निर्णय कहीं अधिक प्रभावी होगा। लेकिन क्या यह केवल एक प्रतीकात्मक कदम है, या सचमुच कोई सार्थक कदम? वहीं, दूसरी ओर, डेनमार्क, स्पेन और आयरलैंड जैसे देश अधिक कड़े कदम उठाने की वकालत कर रहे हैं। इन देशों का मानना है कि यूरोपीय संघ को अब शब्दों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने की जरूरत है। डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लुके रासमुसन ने स्पष्ट रूप से कहा कि हम इजरायल के साथ दोस्ती बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन वहां की वर्तमान सरकार की नीतियों से असहमत हैं। उन्होंने व्यापार प्रतिबंधों और मंत्रियों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव भी दिया, जिससे यह साफ होता है कि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच इस मुद्दे पर गहरे मतभेद हैं। यह सवाल महत्वपूर्ण है कि यूरोपीय संघ, जो स्वयं को वैश्विक कूटनीतिक प्रभावक मानता है, इस संकट में अपनी भूमिका को किस प्रकार निभाएगा। क्या इस संघर्ष में केवल शब्दों की राजनीति के सहारे संकट के समाधान की कोई उम्मीद की जा सकती है? या फिर यूरोपीय संघ को अपनी नीति में बदलाव करने और इसे कड़ा बनाने की जरूरत है? जर्मनी और ऑस्ट्रिया जैसे देशों के लिए इजरायल पर प्रतिबंध लगाना एक ऐसा कदम है, जो न केवल इजरायल के साथ उनके संबंधों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि पूरी यूरोपीय कूटनीतिक नीति को भी कमजोर बना सकता है। यूरोपीय संघ के भीतर इस मुद्दे पर एकजुटता की कमी वैश्विक स्तर पर उसकी साख को कमजोर कर सकती है। अगर यूरोपीय संघ के भीतर सहमति नहीं बनती, तो इसका मतलब यह होगा कि उसकी अंतर्राष्ट्रीय आवाज पूरी दुनिया में बेअसर हो जाएगी। यह संकट सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यूरोपीय संघ के भीतर कूटनीतिक दृष्टिकोण और उसकी अंतर्राष्ट्रीय भूमिका को लेकर बड़े सवाल खड़े करता है। यूरोपीय संघ के देशों ने विशेषकर फ्रांस, लक्समबर्ग, आइसलैंड, और स्पेन ने इजरायल की गाजा पर स्थायी कब्जे की योजना की आलोचना की है और फिलिस्तीनियों को उनकी भूमि से बेदखल करने को अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। इन देशों ने इजरायली सेना से तत्काल ऑपरेशनों को रोकने की अपील की है। यह व्यापक आलोचना दर्शाती है कि यूरोपीय संघ के भीतर अब गाजा में मानवीय संकट को लेकर कोई सहमति बनाना असंभव प्रतीत हो रहा है। वास्तव में इस असमंजस की स्थिति में यूरोपीय संघ को अपनी नीति में एक बड़ी बदलाव की आवश्यकता है। क्या संघ अपने सदस्य देशों के मतभेदों को कम करने के लिए एक साझा मंच पर आ सकता है? या फिर उसकी नीतियां केवल सांकेतिक रूप से रहेंगी, जिनका वास्तविक प्रभाव न के बराबर होगा? यह संकट यूरोपीय संघ के सामने एक ऐसा महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां उसे अपने कूटनीतिक दृष्टिकोण और वैश्विक प्रतिबद्धताओं पर पुन: विचार करने की आवश्यकता है। अगर यूरोपीय संघ इस बार भी ठोस कदम उठाने में विफल रहता है, तो उसकी साख और प्रभावशीलता को गंभीर धक्का लग सकता है। यूरोप को इस समय एक सशक्त और साझा दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो न केवल इजरायल, बल्कि गाजा में संघर्ष झेल रहे फिलिस्तीनियों के लिए भी उम्मीद की किरण बने। क्या यूरोपीय संघ इस महत्वपूर्ण अवसर पर अपनी जिम्मेदारी निभा पाएगा? यह सवाल अब समय के साथ और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।