पूर्वांचल प्रहरी डेस्क संवाददाता गुवाहाटी : दिल्ली के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नजर अब असम पर है।  इसलिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत एक या दो दिन के लिए नहीं, बल्कि पूरे पांच दिनों के कार्यक्रम लेकर असम आए हैं। गुरुवार शाम गुवाहाटी पहुंचे आरएसएस प्रमुख 26 फरवरी की सुबह अरुणाचल प्रदेश के लिए रवाना होंगे। सूत्रों के अनुसार मोहन भागवत के दौरे का मुख्य उद्देश्य आगामी असम विधानसभा चुनाव है। आरएसएस असम में 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और सरकार पर निर्भर रहने के बजाए दिल्ली की तरह खुद पहल करना चाहता है। गौरतलब है कि दिल्ली में भाजपा की जीत में आरएसएस की अहम भूमिका रही है। पिछले कुछ वर्षों में आरएसएस ने दिल्ली में 10 विशिष्ट मुद्दों पर 50,000 छोटी-छोटी बैठकें कीं, जिनमें प्रतिभागियों की संख्या नगण्य रही, लेकिन आरएसएस अपने मुद्दों को बैठकों में भाग लेने वाले सभी लोगों के दिलों में पहुंचाने में कामयाब रहा। आरएसएस की उक्त बैठकों में जल निकासी, स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, सड़क विकास, यमुना नदी की सफाई, वायु प्रदूषण, आव्रजन समस्या, शौचालय और रोजगार जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई थी। दिल्ली में आरएसएस द्वारा इन 10 मुद्दों पर की गई 50,000 छोटी-छोटी बैठकों से भाजपा को बड़े नतीजे मिले। इसलिए आरएसएस असम में भाजपा को चुनावी जीत दिलाने के लिए नई दिल्ली के अनुभव को लागू करने की कोशिश कर रहा है। आरएसएस राज्य में विभिन्न स्तरों पर लोगों में भाजपा और सरकार के प्रति गुस्से और असंतोष को लेकर चिंतित है। आरएसएस 2026 के चुनाव में असम में दिल्ली मॉडल लागू करना चाहता है। इसलिए मोहन भागवत का असम दौरा आगामी विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में अधिक महत्वपूर्ण है। गुवाहाटी प्रवास के दौरान आरएसएस प्रमुख स्वयंसेवकों के साथ व्यापक चर्चा करेंगे। भागवत के गुवाहाटी से लौटने के बाद नागपुर में 2026 के चुनावों का रोडमैप तय किया जाएगा और भाजपा इसी रोडमैप के अनुसार चुनाव अभियान में आगे बढ़ेगी। हालांकि आम मतदाताओं में किसी भी तरह की प्रतिक्रिया से बचने के लिए आरएसएस और भाजपा अपने उद्देश्यों को अलग-अलग पूरा करेंगे। आरएसएस प्रमुख स्वयंसेवकों के साथ इस बात पर भी चर्चा करेंगे कि दिल्ली मॉडल को असम में कैसे लागू किया जा सकता है। सूत्र के अनुसार, दिल्ली की तरह असम में भी ऐसे मुद्दों का चयन किया जाएगा जो असम के मतदाताओं के लिए चिंता का विषय हों और भाजपा चुनावी वैतरणी पार करने के लिए इस भावना को अपने मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगी। गौरतलब है कि राज्य भाजपा अध्यक्ष के रूप में एक स्वयंसेवक की नियुक्ति के पीछे भी आरएसएस की भूमिका रही।