2024 चुनावी साल रहा। यह न सिर्फ  भारत के लिए बल्कि दुनियाभर के लिए चुनावी साल के रूप में गिना जाएगा। इस साल 70 से अधिक देशों में चुनाव हुए जिनमें चार अरब से अधिक लोगों ने वोट डाले। एशिया से लेकर अफ्रीका और यूरोप तक हर महाद्वीप चुनावी मूड में रहा। 27 देशों वाला यूरोपियन यूनियन भी चुनावी रंग में रंगा रहा। इन चुनावों से दुनिया कितनी बदली, किस तरह के समीकरण बने-बिगड़े, ये तो आने वाला वक्त बताएगा। इसी कड़ी में एशियाई देशों की बात करें तो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के साथ-साथ पाकिस्तान, भूटान, ताइवान, इंडोनेशिया और मालदीव में आम चुनाव हुए।  यूरोप के भी दर्जनभर से ज्यादा देशों में इस साल वोट डाले गए, जिनमें पुर्तगाल से लेकर बेलारूस, फिनलैंड और स्लोवाकिया तक शामिल हैं। अफ्रीकी देशों में इस साल सबसे अधिक चुनाव हुए, वहीं, चाड, घाना, कोमोरोस, अल्जीरिया, बोत्सवाना, मॉरीशस, मोजाम्बिक, मॉरिटानिया, रवांडा, सेनेगल, सोमालीलैंड और ट्यूनीशिया में भी वोट डाले गए।  इसके अलावा अमरीका, ब्रिटेन, मैक्सिको और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में भी चुनाव आयोजित किए गए। इसीलिए 2024 को चुनावी सुपर ईयर कहा गया। जब दुनिया की लगभग आधी आबादी ने अपनी-अपनी सरकारों को चुना, इनमें अमरीका से लेकर भारत तक दर्जनों लोकतांत्रिक देश शामिल थे। अमरीका में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर राष्ट्रपति चुनाव के दौरान दो बार जानलेवा हमले हुए। फिर भी उन्होंने चुनाव में स्पष्ट जीत हासिल की और अगले महीने सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की उम्मीद है। ट्रंप के चुनाव के बाद कुछ हलकों में अशांति की आशंका थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैक्सिको में 2024 में चुनाव हुआ, राष्ट्रपति चुनाव देश के इतिहास का सबसे हिंसक चुनाव साबित हुआ। चुनाव से पहले 37 उम्मीदवारों की हत्या हुई। बावजूद इसके देश ने पहली महिला राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम को चुना। 2024 में चार महाद्वीपों में कई मौजूदा नेताओं को सत्ता से हटाया गया। कई बार ये बदलाव हिंसक थे, लेकिन अंतत: लोकतंत्र के एक मूल सिद्धांत जनता की मर्जी से सत्ता हस्तांतरण का पालन हुआ। भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में लंबे समय से शासन कर रही पार्टियों ने अपनी सत्ता तो बचाई, लेकिन बहुमत खो दिया। दक्षिण कोरिया के हालिया राजनीतिक संकट ने लोकतंत्र के स्वास्थ्य की अहमियत को रेखांकित किया। देश के राष्ट्रपति यून सुक योल ने एक शाम टीवी पर आपातकाल लागू करने की घोषणा की, लेकिन सांसदों और बड़ी संख्या में जनता के विरोध के कारण उन्हें अपना फैसला पलटना पड़ा। संसद ने बाद में राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाया। हालांकि यून ने इस्तीफे की मांग ठुकरा दी और कहा कि वह संवैधानिक अदालत के फैसले का इंतजार करेंगे। इस घटना ने बाजारों और दक्षिण कोरिया के सहयोगी देशों को हिला दिया जो परमाणु हथियारों से लैस उत्तर कोरिया को लेकर चिंतित हैं। 2024 में यूरोप के कई हिस्सों में दक्षिणपंथी पार्टियों ने बढ़त हासिल की। फ्रांस, ऑस्ट्रिया, यूरोपीय संसद और रोमानिया में दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत हुईं। रोमानिया में राष्ट्रपति चुनाव दोबारा होगा। इस पर रूसी हस्तक्षेप के आरोप लगे हैं। इन घटनाओं ने क्या यूरोप 1930 के दशक की स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जैसी बहस छेड़ दी है। उस दौर में फासीवाद ने जोर पकड़ा था। जॉर्जिया और मोल्दोवा में रूस समर्थक पार्टियों का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा। 2024 में कोई भी ऐसा प्रयास नहीं हुआ जिसने सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण को रोका हो। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि लोकतंत्र कमजोर हो रहा है, तानाशाही और ज्यादा दमनकारी हो रही है। रूस, ईरान और वेनेजुएला में चुनाव महज दिखावा साबित हुए। रिपोर्ट कहती है कि 2024 में हुए 62 चुनावों में से 25 फीसदी में मतदाताओं के पास कोई असली विकल्प नहीं था। 2025 में कुछ ही देशों में बड़े चुनाव होंगे। जर्मनी में 23 फरवरी को संसदीय चुनाव होंगे। यह देखना अहम होगा कि दक्षिणपंथी दल यहां कैसा प्रदर्शन करते हैं। 2025 में लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे स्वतंत्र प्रेस और न्यायपालिका पर नए नेताओं का प्रभाव दिखेगा। अमरीका में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में उनकी नीतियों पर नजर रहेगी। उन्होंने पहले ही मुख्यधारा की प्रेस को भ्रष्ट बताया और कहा कि वह अपने राजनीतिक विरोधियों, जासूसी अधिकारियों और जांचकर्ताओं की जांच कर सकते हैं।