सनातन धर्म में श्रीगणेशजी की महिमा अपरम्पार है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में 33 कोटि देवी-देवताओं में भगवान श्रीगणेश जी को प्रथम पूज्यदेव माना गया है। समस्त शुभकार्यों का प्रारम्भ श्रीगणेशजी की ही पूजा-अर्चना से होता है। ऐसी मान्यता है कि श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना से सर्वविघ्न खत्म होकर जीवन में सुख-समृद्धि, सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। प्रत्येक मास की चतुर्थी तिथि भगवान श्रीगणेशजी को समर्पित है। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि प्रत्येक मास के दोनों पक्ष में चतुर्थी तिथि के दिन व्रत-उपवास रखकर भगवान श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना करना विशेष फलदाई रहता है। चान्द्रमास में शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि वरद् वैनायकी श्रीगणेश चतुर्थी के नाम से जबकि कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। इस बार मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी तिथि गुरुवार, 5 दिसंबर को पड़ रही है। चतुर्थी तिथि बुधवार, 4 दिसंबर को दिन में 1 बजकर 11 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन गुरुवार, 5 दिसंबर को दिन में 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र बुधवार, 4 दिसंबर को सायं 5 बजकर 15 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन गुरुवार, 5 दिसंबर को सायं 5 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। फलस्वरूप वरद् वैनायकी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत गुरुवार, 5 दिसंबर को रखा जाएगा। श्रीगणेश भक्त श्रद्धाभक्ति व आस्था के साथ श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना करके मनोरथ की पूर्ति तथा पुण्यफल प्राप्त करेंगे। पूजा का विधान : विमल जैन के अनुसार व्रतकर्ता को प्रातःकाल अपने समस्त दैनिक नित्य कृत्यों से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। तदुपरान्त अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करने के पश्चात् वैनायकी श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। तत्पश्चात् श्रीगणेशजी की पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार से विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। श्रीगणेश का शृंगार करके उन्हें दूर्वा एवं दूर्वा की माला, मोदक (लड्डू), अन्य मिष्ठान्न ऋतुफल आदि अर्पित किए जाते हैं।
श्रीगणेश चतुर्थी व्रत से होगी सुख-सौभाग्य में अभिवृद्धि
