हिन्दू धर्मशास्त्रों में मार्गशीर्ष माह का प्रमुख पर्व है श्रीकालभैरव अष्टमी। इस दिन कालभैरव उत्पत्ति का दिवस विधि-विधानपूर्वक मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में विशिष्ट माह की विशिष्ट तिथियों पर देवी-देवताओं का प्राकट्य दिवस श्रद्धा भक्तिभाव से मनाए जाने की धार्मिक परम्परा है। इस बार यह पर्व 23 नवंबर, शनिवार को हर्ष उमंग व उल्लास के साथ मनाया जाएगा। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि 22 नवंबर, शुक्रवार को सायं 6 बजकर 08 मिनट पर लगेगी जो कि 23 नवंबर, शनिवार को सायं 7 बजकर 58 मिनट तक रहेगी। मघा नक्षत्र 22 नवंबर, शुक्रवार को सायं 5 बजकर 10 मिनट से 23 नवंबर, शनिवार को सायं 7 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। 23 नवंबर, शनिवार को मध्याह्न व्यापिनी अष्टमी तिथि का मान होने से इस दिन श्रीकालभैरव जी का उत्पत्ति दिवस भक्तिभाव से मनाया जाएगा। ऐसी धार्मिक पौराणिक मान्यता है कि आज के दिन देवाधिदेव महादेवजी ही कालभैरव के रूप में अवतरित हुए थे। इसलिए इन्हें साक्षात् भगवान शिवजी का स्वरूप माना जाता है। भगवान शिव के दो स्वरूप हैं—पहला स्वरूप भक्तों को अभय प्रदान करने वाले विश्वेश्वर के रूप में तथा दूसरा स्वरूप दण्ड देनेवाले श्रीकालभैरव के रूप में, जो समस्त दुष्टों का संहार करते हैं। भगवान विश्वेश्वर (शिवजी) का रूप अत्यन्त सौम्य व शान्ति का प्रतीक है, जबकि श्रीभैरव जी का रूप अत्यंत रौद्र व प्रचण्ड है। कालभैरव जी का वाहन श्वान है, इनके हाथ में त्रिशूल व दण्ड सुशोभित है, फलस्वरूप इन्हें दण्डपाणि भैरव कहा गया है। श्रीकालभैरव जी की श्रद्धा, आस्था भक्तिभाव के साथ आराधना करने से जीवन में सुख-सौभाग्य बना रहता है। ऐसे करें पूजा : ज्योतिषविद् ने बताया कि प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारणकर अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना के बाद दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध व कुश लेकर श्रीकालभैरव जी के पूजा-व्रत का संकल्प लेना चाहिए। भैरव जी की पंचोपचार, दशोपचार एवं षोडशोपचार पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
श्रीकालभैरव अष्टमी का व्रत है अत्यंत चमत्कारिक
