श्रीश्याम एवं परम् ब्रह्मः

श्रीश्याम एवं परम् तपः।

श्रीश्याम एवं परम् जाप्यम् 

श्रीश्यामो ब्रह्म तारकम्।।

6श्रीश्याम रहस्य 1718

अर्थात् नीलमणि की आभावाले पाण्डव कुलभूषण श्रीश्याम सुन्दर परात्पर परम् ब्रह्म परमेश्वर हैं,अतुलीत बलशाली तेजस्वी खाटू नारायण श्रीश्याम प्रभु ही तपस्या करने योग्य हैं,नीले घोड़े के असवार नील कमल एवम् मेघ की कान्तिवाले सुहृदय (सुन्दर हृदयवाले)साक्षात् नारायण श्रीश्याम सुखधाम ही भवसागर (आवागमन)से मुक्ति दिलाने वाले तारक ब्रह्म हैं। हम इन्हें नित्य निरंतर अहर्निश कोटिशः बारम्बार प्रणाम निवेदन करते हैं।)

श्रीश्याम प्रभु ने स्वयं अपने दिव्य जन्म (प्राकट्य) के विषय में कहा है--

क्षत्रियाणाम् कुले जातस्त्वहं धर्माभिरक्षीणाम्।

तस्मात्ते पातकं कर्तुम् न दास्यामि कदाचन।।

[स्कंद पुराण/कौमारिल खण्ड/अ04,श्लोक39]

अर्थात्-‘मैंने धर्म की रक्षा करने वाले क्षत्रियों के कुल में जन्म लिया है; इसलिए मैं किसी भांति पाप करने नहीं दूंगा।’

निष्पाप होकर ही निष्कपट भावसे सुहृदय खाटू नारायण भगवान श्री श्याम की पूजा सम्भव है अन्यथा वे स्वीकार नहीं करते। उनकी अभय वाणी व प्रतिज्ञा भी कम विलक्षण नहीं है ‘माम् सेब्यम् पराजितः’। स्वयं भगवान श्री श्याम सुन्दर कहते हैं--‘मैं हारे हुए की हार को जीत (विजय) में परिणत करता हूं अर्थात् उसे ‘विजई भवः’ का आशीर्वाद देकर विजई बनाता हूं। भला साक्षात् नारायण के अतिरिक्त दूसरा करुणा वरूणालय कौन होगा? जो हारे का सहारा एवम् संकट मोचन बनकर उसे  निष्कंटक कर सर्वांगीण सौख्य  प्रदान कर सके। द्वापर युगमें श्रेष्ठ पाण्डव कुल में अवतार ग्रहण कर कलिकाल में स्मरण मात्र से सभी की मनोकामना पूर्ण कर देने का सामर्थ्य का वरदान  स्वयं लीलापुरुषोत्तम भगवान्  श्रीकृृष्णने देते हुए कहा था ‘श्रेष्ठ वीर ! कलियुगमें मेरे ही ‘श्याम’ नाम से महान पूज्यनीय होंगे। अपने पूजनेवाले भक्तों की समग्र मनोकामना ‘कामना कल्पवृक्षम्’की भांती पूर्ण करोगे। श्रीश्याम प्रभुके जितने भी श्लोक,भजन व आख्यान हैं उनमें उनकी स्तुति भगवान श्रीकृृष्ण रूप से ही है। महाबली भीमका गन्धर्व विवाह  डीमापुर (नगालैंड) की राजकुमारी हिडिम्बाके साथ हुआ था। हिडिम्बा ने वीरवर घटोत्कच को जन्म दिया। घटोत्कच जब विवाह योग्य हुए तब भगवान श्रीकृृष्णकी आज्ञा से मणिपुर के तत्कालीन राजा मूर की पुत्री ‘मौर्वी’ (कामकटन्कटा) से भीमपुत्र घटोत्कच का विवाह प्राग् ज्योतिषपुर में  हुआ। श्रेष्ठ सुन्दर प्राग् ज्योतिषपुर में उस वक्त अद्भुत कर्मा दैत्य मूर की पुत्री अतिबलशालिनी घोररुपा कामकटन्कटा नील पर्वत वासिनी अखण्ड ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च शक्ति पीठाधीश्वरी पराम्बा भगवती मां कामाख्या की भक्तमती थी। मां कामाख्या ने उन्हें अजेय खडग एवम् खेटक 6अस्त्र8 और  अद्वितीय बुद्धि तथा संग्राम में अतुल शक्ति का वरदान दे रखा था। महाबली भीमके हिडम्बज पुत्र महाबली घटोत्कच की इन्हीं मूर पुत्री से विवाह संपन्न हुआ। इक्यांशी [81] हजार श्लोकोंवाली संहिता श्रीस्कंद महापुराण के माहेश्वर खण्ड अंतर्गत 56 से 66 अध्याय (11अध्याय) में कुल 796 श्लोकों में श्रीहरि खाटू नारायण भगवान श्री श्याम सुन्दर का सम्पूर्ण चारित्र संस्कृृत वांगमयमें (स्वरुप) में संवर्दि्धत है। स्तवनीय  स्तोत्र समूह भी उन-उन अध्यायोंमें मूल संस्कृृत में उपनिबद्ध है। इतिहास-पुराण साहित्य पंचम वेदके रूप में मान्यता प्राप्त है। पुराणों में वर्णित आख्यान-उपाख्यान अत्यंत अद्भूत एवम् विचित्र, किन्तु मानव जीवन केलिए अतीव उपयोगी एवम् हितकर हैं। सर्वोत्तम पुण्यातिपुण्य कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी रोहिणी नक्षत्र में सौभाग्यशालिनी मां कामकटन्कटा (मौर्वी) के गर्भ से विलक्षण तेजोराशि बालक बर्बरीक का जन्म हुवा। दैववश  जन्म लेते ही वे बड़े होने लगे। इनके पिता वीरवर भीमपुत्र घटोत्कच ने द्वारिका लेजाकर इन्हें भगवान श्रीकृृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। भगवान श्रीकृृष्ण ने आशीर्वाद दे स्नेह से इनका आलिंगन करते हुए पहला नाम सुहृदय दिया। भगवान् श्रीकृृष्ण की आज्ञा से महिसागर तीर्थ में नारदजी द्वारा स्थापित आद्यशक्ति नव दुर्गाओं की आराधना की तथा मगध देश के तपस्वी ब्राह्मण विजयसेन को निर्विघ्न सिद्धि प्राप्ति हेतु तपस्या में सहायता करते हुए अनेक दुर्दांत दैत्यों को मौत के घाट उतारा। इनकी घोर तपस्या इन्दि्रय निग्रह एवम् भक्ति से प्रसन्न होकर देवियों ने अतुलीत बल का वरदान देते हुए कहा-- वत्स ! हम तुम्हें अतुलनीय बल का वरदान देती हैं। संसार में तम्हें कोई भी जीत नहीं सकेगा। इनकी तरकश में तीन बाण देते हुए पुनः कहा- हे श्याम ! एक ही बाण से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जीतने की तुम्हारी क्षमता होगी। कलिकाल में भगवान श्री कृृष्ण के वरदान से महान पूजनीय होंगे तथा अपने भक्तों की सम्पूर्ण मनोकामना पूर्ण करने का सामर्थ्य होगा। महाभारत समरांगण की तैयारियां जब चरम सीमा पर थी, धर्म का पक्ष लेनेवाले धर्मध्वज स्वयं भगवान् श्री कृृष्ण पांडवों के पक्षको मजबूत करने में संलग्न थे। जहां भगवान् श्री कृृष्ण हों, वहां  विजय श्री तो सुनिश्चित है अर्थात् कौरवों का हारना निश्चित था। अपनी माता को दिए गए वचनों की प्रतिज्ञा के साथ महाभारत युद्ध देखने हेतु अपने नीले घोड़े पर द्रुत गति से अग्रसर हो रहे थे रास्ते में एक वट वृक्ष के नीचे ब्राह्मण का छद्म वेशधारी भगवान श्रीकृृष्ण ने इनकी प्रतिज्ञा ‘हारे के सहारे’ यानि हारे को जीताने वाली बात को ध्यान में रख कर इनसे शीश का दान मांगा। इन्होंने सहर्ष अपने शीश का दान देते हुए महाभारत युद्ध को आद्योपांत देखने का वर मांगा। इनके पावन शीश को कुरुक्षेत्र समरांगण के पास एक पहाड़ी के शिखर पर स्थापित किया गया। अठारह दिनों तक महासंग्राम चला, विजय श्री पाण्डवो की भगवान श्रीकृृष्ण की महति कृृपा से हुई। गर्वान्वित पाण्डवों ने विजय का श्रेय स्वयं पर ही लेने लगे। गर्व खरारि भगवान श्रीकृृष्ण पाण्डवों सहित शीश के पास गए। शिखर पर स्थापित श्री श्याम ने भगवान श्रीकृृष्ण का अभिवादन करते हुए प्रमाण पूर्वक कहा- हे पाण्डव वीरों ! आप व्यर्थ का परमाद करते हैं। यह विजय तो  भगवान श्री कृृष्ण की नीति के कारण हुई है,इस विजय का श्रेय तो भगवान श्रीकृृष्ण को ही जाता है। महासमर में भगवान श्री कृृष्ण का सुदर्शन चक्र शत्रुओं को काट रहा था तथा महासती द्रौपदी काली का रूप धारण कर हाथ में खप्पर लेकर रक्त पान कर रही थी। भगवान् श्रीकृृष्ण की जय हो,ऐसा कह कर पावन शीश चुप हो गया। देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की।