भारतीय संस्कृति के हिन्दू सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि की विशेष महिमा है। कार्तिक पूर्णिमा अपने आप में अत्यन्त शुभ फलदाई मानी गई है। कार्तिक पूर्णिमा को ‘त्रिपुरी पूर्णिमा’ एवं ‘त्रिपुरारी पूर्णिमा’ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक व पौराणिक मान्यता है कि इस तिथि के दिन देवाधिदेव महादेवजी ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था तथा शिवजी के आशीर्वाद से दुर्गारूपिणी पार्वती जी ने महिषासुर का वध करने के लिए शक्ति अर्जित की थी। इसी दिन सायंकाल भगवान श्रीविष्णुजी मत्स्यावतार के रूप में अवतरित हुए थे। कार्तिक पूर्णिमा का पुनीत पर्व 15 नवंबर, शुक्रवार को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि  कार्तिक शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 15 नवंबर, शुक्रवार को प्रातः 6 बजकर 20 मिनट पर लगेगी जो कि उसी दिन अर्द्धरात्रि के पश्चात् 2 बजकर 59 मिनट तक रहेगी। भरणी नक्षत्र 14 नवंबर, गुरुवार अर्द्धरात्रि 12 बजकर 33 मिनट से 15 नवंबर, शुक्रवार को रात्रि 9 बजकर 55 तक रहेगा। तत्पश्चात् कृतिका नक्षत्र लग जाएगा। इस दिन भगवान श्रीविष्णुजी एवं देवाधिदेव महादेवजी, श्रीशिवजी के पुत्र श्रीकार्तिकेय जी की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। 18 अक्टूबर, शुक्रवार से प्रारम्भ कार्तिक माह के धार्मिक नियम-संयम आदि का समापन आज के दिन कार्तिक पूर्णिमा (15 नवंबर, शुक्रवार) को हो जाएगा। कैसे करें पूजा : ज्योतिषविद् ने बताया कि प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। तत्पश्चात् अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना के बाद कार्तिक पूर्णिमा के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूर्णिमा तिथि के दिन प्रातःकाल गंगा-स्नान करके देव-दर्शन के पश्चात् ब्राह्मण को यथाशक्ति दान करके पुण्यफल अर्जित करना चाहिए। सायं प्रदोषकाल में दीपदान करने का प्रावधान है। देवालयों में दीपक प्रज्वलित करके आकर्षक व मनमोहक दीपमालिका सजाई जाएगी। गंगाजी एवं सरोवरों के तट पर दीपदान किया जाएगा। आज के दिन पीपल, आंवला एवं तुलसीजी के वृक्षों का जलसिंचन करके दीपक जलाकर उनका पूजन किया जाता है।