भारतीय सनातम धर्म में अक्षय पुण्य फल की कामना के संग मनाया जाने वाला पर्व अक्षय नवमी कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन हर्ष, उमंग एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। अक्षय नवमी को आंवला नवमी या कुष्माण्ड नवमी के नाम से भी जाना जाता है। अक्षय नवमी जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि इस दिन किए गए पुण्य और पाप, शुभ-अशुभ समस्त कार्यों का फल अक्षय (स्थाई) हो जाता है। तीन वर्ष तक लगातार अक्षय नवमी का व्रत-उपवास एवं पूजा करने से अभीष्ट की प्राप्ति बतलाई गई है। आंवले के वृक्ष के पूजन से सुहागिन महिलाओं का सुहाग अखण्ड रहता है तथा संतान की प्राप्ति भी बतलाई गई है। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि इस बार यह पर्व 10 नवंबर, रविवार को मनाया जाएगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 9 नवंबर, शनिवार को रात्रि 10 बजकर 46 मिनट पर लगेगी, जो कि अगले दिन 10 नवंबर, रविवार को रात्रि 9 बजकर 02 मिनट तक रहेगी। धनिष्ठा नक्षत्र 9 नवंबर, शनिवार को दिन में 11 बजकर 48 मिनट से 10 नवंबर, रविवार को दिन में 11 बजकर 00 मिनट तक रहेगा, तत्पश्चात् शतभिषा नक्षत्र लग जाएगा, जो कि 11 नवंबर, सोमवार को प्रातः 9 बजकर 41 मिनट तक रहेगा। अक्षय नवमी का व्रत 10 नवंबर, रविवार को रखा जाएगा। अक्षय नवमी का मान संपूर्ण दिन रहेगा। अक्षय नवमी के दिन व्रत रखकर भगवान श्रीलक्ष्मीनारायण-श्रीविष्णु की पूजा अर्चना तथा आंवले के वृक्ष के समीप या नीचे बैठकर भोजन करने की पौराणिक व धार्मिक मान्यता है। व्रतकर्ता को अपने दैनिक नित्य कृत्यों से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना के पश्चात् अक्षय नवमी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा करने वाले का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। भगवान श्रीलक्ष्मीनारायण की पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजा की जाती है। आज के दिन भगवान श्रीविष्णु का प्रिय मंत्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करने पर भगवान शीघ्र प्रसन्न होकर भक्त को उसकी अभिलाषा-पूर्ति का वरदान देते हैं। पूजा का विधान : विमल जैन ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार इस पर्व पर आंवले के वृक्ष की पूजा से अक्षय फल (कभी न खत्म होनेवाले पुण्यफल) की प्राप्ति होती है। साथ ही सौभाग्य में अभिवृद्धि होती है। इस पर्व पर आंवले के वृक्ष की पूजा पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से की जाती है। पूजन करने के पश्चात् वृक्ष की आरती करके परिक्रमा करनी चाहिए। 

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