याराम शरण गुप्त का जन्म चिरगांव, झांसी में हुआ था। वे प्रसिद्ध हिंदी कवि मैथिली शरण गुप्त के छोटे भाई थे। प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने घर में ही गुजराती, अंग्रेजी और उर्दू भाषा सीखी थी। 1914 में उन्होंने अपनी पहली रचना ‘मौर्य विजय’ लिखी। बुंदेलखंड की वीरता और प्राकृतिक सुषमा के प्रति उनका स्वभावगत प्रेम था। घर के वैष्णव संस्कारों और गांधीवाद से गुप्त जी का व्यक्तित्व विकसित हुआ। मैथिली शरण गुप्त की काव्यकला और उनके युगबोध को सियाराम शरण ने यथावत अपनाया था। इसलिए उनके सभी काव्य द्विवेदी युगीन अभिधावादी कलारूप पर ही आधारित हैं। विचार की दृष्टि से भी सियाराम शरण गुप्त गांधी के परदुखकातरता, राष्ट्रप्रेम, विश्वप्रेम, विश्वशांति, हृदय परिवर्तनवाद, सत्य और अहिंसा से आजीवन प्रभावित रहे। उनका काव्य गांधीवादी निष्ठा की उपज है। उनकी भाषा-शैली सहज, सरल, साहित्यिक खड़ीबोली हिंदी है। उनकी रचनाओं की शैली यथार्थपरक, सरस, वर्णनात्मक, विचारात्मक, चित्रात्मक और भावात्मक है।
मानव प्रेम के कारण कवि का निजी दुख, सामाजिक दुख के साथ एकाकार होता हुआ वर्णित हुआ है। ‘विषाद’ में कवि ने अपने विधुर जीवन और ‘आर्द्रा’ में अपनी पुत्री रमा की मृत्यु से उत्पन्न वेदना के भावोद्गार प्रकट किए हैं। इसी प्रकार अपने हृदय की सच्चाई के कारण गुप्त जी द्वारा वर्णित जनता की दरिद्रता, कुरीतियों के विरुद्ध आक्रोश, विश्वशांति जैसे विषयों पर उनकी रचनाएं केंद्रित हैं। उनमें जीवन के प्रति करुणा का भाव जिस सहज ढंग से व्यक्त हुआ है, उससे उनका हिंदी काव्य में एक विशिष्ट स्थान बन गया है। हिंदी की गांधीवादी राष्ट्रीय धारा के वे प्रतिनिधि कवि हैं। उनके गद्य साहित्य में भी उनका मानव प्रेम ही व्यक्त हुआ है। कथा साहित्य की शिल्प विधि में नवीनता न होने पर भी नारी और दलित वर्ग के प्रति उनका दयाभाव देखते ही बनता है। समाज की समस्त असंगतियों के प्रति इस कवि ने कहीं समझौता नहीं किया, पर उनका समाधान सर्वत्र गांधीजी की तरह उन्होंने वर्गसंघर्ष के आधार पर न करके हृदय परिवर्तन द्वारा ही किया है। जाति, वर्ण, दल, वर्ग से परे शुद्ध मानवतावाद ही उनका कथ्य है। दरअसल, उनके अनेक काव्य भी पद्यबद्ध कथाएं ही हैं और गद्य तथा पद्य में एक ही उक्त मंतव्य व्यक्त हुआ है। गुप्त जी के पद्य में नाटकीयता तथा कौशल का अभाव होने पर भी संतों जैसी निश्छलता और संकुलता का अप्रयोग उनके साहित्य को आधुनिक साहित्य के शोर में शांत, स्थिर, सात्विक गौरव देता है, जो हृदय की पशुता के अंधकार को दूर करने के लिए अपनी ज्योति में आत्ममग्न और निष्कंप भाव से स्थित है। सियाराम शरण गुप्त की प्रमुख रचनाएं हैं- ‘मौर्य विजय’, ‘अनाथ’, ‘आर्द्रा’, ‘विषाद’, ‘दूर्वा दल’, ‘आत्मोत्सर्ग’, ‘पाथेय’, ‘मृण्मयी’, ‘बापू’, ‘उन्मुक्त’, ‘दैनिकी’, ‘नकुल’, ‘सुनंदा और गोपिका’ काव्य और कहानी संग्रह-‘मानुषी’, नाटक- ‘पुण्य पर्व’, अनुवाद- ‘गीता संवाद’ हैं। उन्हें दीर्घकालीन साहित्य सेवा के लिए सन 1962 में ‘सरस्वती हीरक जयंती’ के अवसर पर सम्मानित किया गया। 1941 में उन्हें नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी द्वारा ‘सुधाकर पदक’ प्रदान किया गया।