आगामी चार राज्यों के विधानसभा चुनाव आज के हालातों में देश के सत्ताधारी दल और प्रतिपक्ष दोनों के लिए बहुत अहम हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद लगातार प्रतिपक्ष भाजपा को हारा हुआ बताकर अपनी कथित जीत का जो ढिंढोरा पीट रहा है उसने जनमानस में यह जिज्ञासा जगाई है कि मोदी सरकार दो दलों जेडीयू और टीडीपी के सहयोग से बनी, मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन राहुल गांधी अखिलेश कैसे जीत गए। विपक्ष ने यह नैरेटिव खड़ा किया और हर मंच से इसका प्रचार किया है। जनता अब टकटकी लगाए देख रही है कि 4 अक्तूबर को विधानसभाओं के परिणाम क्या कहते हैं। क्या वाकई राहुल और अखिलेश जीत गए और मोदी हार गए। इसमें कोई शक नहीं कि इस बार मोदी और भाजपा को अपने दम पर 272 सीटें नहीं मिली, लेकिन उतना ही सच यह भी है कि इंडी गठबंधन के सभी दलों की जीती हुई सीटें जोड़ दें तो वे 272 नहीं जीत पाए। अगर जीत गए होते तो सरकार में इंडी के नेता होते न कि मोदी। आंकड़ों की बात करें तो राहुल गांधी की खुशी का कारण 2014 में 44 और 2019 में 52 सीटों से बढ़कर 2024 में 99 सीटों पर पहुंचना है। लेकिन सच्चाई यह है कि ये 99 सीटें गठबंधन के सहयोगी शरद पवार, उद्धव ठाकरे, एमके स्टालिन और अखिलेश यादव की कृृपा का परिणाम हैं जिन्होंने सीट शेयरिंग में कांग्रेस को इतनी सीटें दे दी कि वह अपने परिणामों में 99 सीटों पर पहुंच गए। शुद्ध रूप में तो कांग्रेस के परफॉर्मेंस में 2019 की तुलना में मात्र 3 सीटों का ही इजाफा हुआ है। यदि महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश में एनसीपी, शिवसेना (उद्धव) तमिलनाडु में एम के स्टालिन और उत्तर प्रदेश में सपा उदारता नहीं दिखाती तो कांग्रेस की साख को जो बट्टा लगता उसकी मिसाल कहीं देखने को नहीं मिलती। इसमें कोई शक नहीं की 99 के इस प्रदर्शन से कांग्रेस की धमनियों में नए रक्त का संचार हुआ है और राहुल गांधी का टूटा हुआ आत्मविश्वास पुनः मजबूत हुआ है, लेकिन इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं हो सकता कि वह सरकार में है या इंडी गठबंधन की सारी राजनीति उनके दम पर चल रही है। इस बात का उल्लेख प्रधानमंत्री ने इस तरह किया कि 1984 के चुनाव के बाद देश में 10 लोकसभा चुनाव हो चुके हैं इसके बाद भी कांग्रेस 250 के आंकड़े को नहीं छू पाई। निश्चित ही यह कांग्रेस की दुखती रग पर उंगली रखना ही है। सच्चाई तो यह है कि कांग्रेस उस अमरबेल की तरह है जिसकी जड़ें नहीं होती लेकिन वह जिस पेड़ पर चढ़ती है उस पेड़ से अपनी भोजन सामग्री जुटा लेती है। प्रधानमंत्री ने दूसरे दलों को चेतावनी देते हुए ठीक ही कहा था कि कांग्रेस परजीवी पार्टी हो गई है।
आज कांग्रेस दूसरे दलों की सीटों और वोटों को हथिया कर 99 सीटें पाकर बेहद खुश है और हो भी क्यों नहीं आखिर उसे विपक्ष के नेता का दर्जा जो मिल गया। इसमें कोई शक नहीं कि वर्तमान सरकार भाजपा के कमजोर प्रदर्शन के कारण बैक फुट पर जरूर है लेकिन वह सत्ता में है इसे कोई नकार नहीं सकता। राहुल गांधी जिस अंदाज में सरकार और मोदी की आलोचना करते हैं वह आने वाले समय में उन्हें भारी पड़ सकता है। विपक्ष के नेता को जितना गंभीर होना चाहिए वह उतने गंभीर दिखाई नहीं देते। यह उनके लगातार बयानों से स्पष्ट हो रहा है। संसद में अटपटे प्रसंगों से अपने भाषण को सजाने से उनकी प्रतिष्ठा में इजाफा नहीं हो रहा बल्कि कभी-कभी हास्यास्पद स्थिति बन जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि वह विपक्ष के नेता हैं और सरकार की आलोचना करना उनका नैतिक और संवैधानिक अधिकार है किंतु उसमें शालीनता होना भी जरूरी है। हाल ही में उन्होंने प्रयागराज में संविधान का सम्मान और उसकी रक्षा कार्यक्रम में कहा कि मैंने मिस इंडिया की लिस्ट देखी, इसमें कोई दलित, आदिवासी या अन्य पिछड़ा वर्ग की महिला नहीं है। प्रधानमंत्री कहते हैं देश सुपर पावर बन गया है। कैसे सुपर पावर बन जाएगा जबकि 90 प्रतिशत लोग सिस्टम से बाहर बैठे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि खिलाड़ी, एक्टर या मिस इंडिया को सरकार नहीं चुनती। यही नहीं अभी-अभी वे जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव में अन्य दलों से गठबंधन के सिलसिले में दौरे पर थे वहां उन्होंने मोदी का मजाक उड़ाते हुए कहा कि इंडिया गठबंधन ने मोदी के कांफिडेंस को हिलाकर रख दिया है। वह जेस्चर बनाते हुए बोले पहले मोदी छाती तान कर बात करते थे और फिर अपने आपको नीचे झुकाकर जेस्चर का प्रदर्शन करते हुए। राहुल बोले अब मोदी झुक कर बात करते हैं। राहुल गांधी ने वहां तालियां तो बटोरीं, लेकिन वह भूल गए कि देश का प्रतिनिधित्व करते हुए तब मोदी यूक्रेन के दौरे पर थे। ऐसे में इतनी हल्की टिप्पणी से मोदी का कुछ बिगड़ा हो या ना बिगड़ा हो किंतु प्रतिपक्ष के नेता की छवि तो उज्जवल नहीं ही हुई। राहुल को मोदी की लकीर मिटाने की जगह खुद की लकीर बड़ी करने की जरूरत है। कश्मीर में वे प्रफुल्लित नजर आए यह किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने श्रीनगर में रात को होटल में खाना भी खाया और आइसक्रीम का आनंद भी लिया। वे दिल पर हाथ रखकर कहें क्या यह 2014 के पहले संभव था। बिल्कुल नहीं। तब नेतागण कश्मीर का दौरा टालने को मजबूर होते थे। आतंकवाद का नंगा नाच इस कदर हावी था कि लोग डरे सहमे रहते थे। 5 अगस्त 2019 के बाद जो हालात बदले हैं यह उसी का नतीजा है कि राहुल और उनकी टीम कश्मीर में खुली हवा में सांस ले पाए। यह उस व्यक्ति नरेन्द्र मोदी के दृढ़ संकल्प के द्वारा ही संभव हुआ जिसने कश्मीर से धारा 370 और 35 ए को जड़ से उखाड़ फेंका।
फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस का घोषणा पत्र देखने पर लगता है कि वे राज्य की जनता को वापस उन्हीं हालातों में ले जाने का आश्वासन दे रहे हैं जिसमें जनता केवल एक वोटर थी जिसके पास न तो अधिकार थे और न सुविधाएं। अब भी वह अपने हित चिंतन से ऊपर नहीं उठ पाई है। यही कारण है कि अपने घोषणा पत्र में वह न केवल आरक्षण समाप्त करने की बात करती है बल्कि वह उन कैदियों की रिहाई की बात भी करती है जो राज्य में गड़बड़ी फैलाने के लिए जेल में हैं। अपने को दोबारा सत्ता में वापसी के लिए अब्दुल्ला एंड पार्टी ने घोषणा पत्र में मुफ्त बिजली पानी, एलपीजी सिलेंडर जैसे वादे किए हैं। यही नहीं पाक परस्ती को मुकम्मल करते हुए पाकिस्तान से बातचीत को प्रोत्साहित करने की बात भी घोषणा पत्र में है। सच्चाई तो यह है कि वोटरों को ललचाने के लिए मुफ्त की घोषणाओं के साथ नेशनल कांफ्रेंस पाकिस्तान, अलगाववादियों और पत्थरबाजों को दोबारा मजबूत करने के इरादे से चुनाव में उतरेगी इसमें कोई दो राय नहीं और इसको कांग्रेस का समर्थन है जो सीटों के तालमेल से स्पष्ट हो गया है। जिसमें 90 सीटों में नेशनल कांफ्रेंस 52 और कांग्रेस 38 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। देखना होगा कि इस गठबंधन को जम्मू कश्मीर में कितनी सफलता मिलती है। नेशनल कांफ्रेंस ही नहीं दूसरी पार्टी पीडीपी का घोषणा पत्र भी पुराने दौर को वापस लाने का वायदा करता नजर आता है। यह भी सत्ता में आने पर धारा 370 और 35 ए को बहाल करने का वादा कर रही है। यदि इन दोनों पार्टियों में से कोई सत्ता में वापसी करती हैं तो मानकर चला जाए कि जनता को नई रोशनी पसंद नहीं है वह उस अंधेरे में ही रहना चाहती है जो इन दोनों सियासी दलों ने अब तक फैलाया है। ठ्ठ
रतलाम (मप्र)
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