भगवान् श्रीकृष्णजी अखिल ब्रह्माण्ड के महानायक व षोडश कला से युक्त, जन-जन के आराध्य देवता माने गए हैं। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि धार्मिक व पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार द्वापर युग के अंतिम चरण में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मध्यरात्रि 12 बजे वृषभ लग्न में मथुरा में हुआ था। इस दिन बुधवार व रोहिणी नक्षत्र से बना जयंती योग था। इस बार यह पर्व 26 अगस्त, सोमवार को मनाया जाएगा। भाद्रपद कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि 25 अगस्त, रविवार को अर्द्धरात्रि के पश्चात् 3 बजकर 40 मिनट से 26 अगस्त, सोमवार को अर्द्धरात्रि के पश्चात् 2 बजकर 20 मिनट तक रहेगी। तत्पश्चात् नवमी तिथि प्रारम्भ हो जाएगी। रोहिणी नक्षत्र 26 अगस्त, सोमवार को दिन में 3 बजकर 56 मिनट से 27 अगस्त, मंगलवार को दिन में 3 बजकर 38 मिनट तक रहेगा। भगवान् श्रीकृष्णजी की जन्मकुण्डली अपने आप में विशेष व अद्भुत है। भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण के समय जन्मकुण्डली में नवग्रहों में से चार प्रमुख ग्रह चंद्रमा, मंगल, वृहस्पति व शनि उच्च राशि में थे। सूर्य, बुध व शुक्र स्वराशि में तथा राहु वृश्चिक और केतु ग्रह वृषभ राशि में विराजमान थे। शास्त्रों के मुताबिक भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार को पूर्ण अवतार माना गया है। ग्रह नक्षत्रों के योग से जयंती योग पर षोडश कलायुक्त जगत योगेश्वर भगवान श्रीकृष्णजी धरती पर अवतरित हुए थे। भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में हिन्दुओं में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लोकप्रिय विशिष्ट पर्व माना गया है। ज्योतिषविद्  ने बताया कि इस बार अष्टमी तिथि की रात्रि में रोहिणी नक्षत्र और सोमवार के दिन जयंती योग का संयोग बना है, जो कि पूजा-अर्चना के लिए अत्यंत ही शुभ फलदाई है। द्वापर में जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, उस समय भी जयंती योग पड़ा था। जो कि भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना के लिए विशेष फलदाई माना गया है। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी पर व्रत उपवास रखकर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाने पर अनन्त पुण्यफल की प्राप्ति होती है।  भगवान श्रीकृष्ण जी की पूजा का विधान : ज्योतिषविद् ने बताया कि व्रतकर्ता को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानादि के पश्चात् स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने इष्ट देवी-देवता की आराधना कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध व कुश लेकर भगवान श्रीकृष्णजी की पूजा-अर्चना एवं व्रत का संकल्प लेना चाहिए। 

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