बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से बाहर करने के लिए लगातार साजिश रची जा रही थी। इसके पीछे बांग्लादेश के कट्टरपंथी तत्वों तथा पाकिस्तानी सेना एवं गुप्तचर एजेंसी आईएसआई का पूरी तरह हाथ रहा है। हालांकि आरक्षण के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत छात्र संगठनों ने शुरू की थी, किंतु उसके पीछे बांग्लादेश का प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी एवं विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की भी साजिश रही है। तत्कालीन हसीना सरकार ने कुछ दिन पहले ही जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया था। ऐसी खबर है कि दुनिया की दो महाशक्तियां अमरीका तथा चीन अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण हसीना सरकार को पसंद नहीं कर रहे थे। सर्वप्रथम छात्र शिविर नाम के विद्यार्थी संगठन के बैनर तले शुरू हुआ आंदोलन कट्टरपंथियों एवं हसीना विरोधी तत्वों के हाथ में चला गया। आरक्षण खत्म करने के लिए चल रहा आंदोलन हसीना सरकार को अस्थिर करने के रूप में तब्दील हो गया। अगर ऐसा नहीं होता तो शेख हसीना के इस्तीफे तथा उनके देश छोड़ने के बाद आंदोलन खत्म हो जाता। फिलहाल बांग्लादेश की सेना ने सत्ता अपने हाथ में ले लिया है। सेना प्रमुख वकार-उज-जमान ने अंतरिम सरकार का गठन करने तथा बीएनपी की प्रमुख खालिदा जिया को रिहा करने की घोषणा की है। इसके बावजूद आंदोलन का न रुकना यह दर्शाता है कि कुछ शक्तियां बांग्लादेश को अस्थिर कर अपना हित साधने में जुटी हुई है। शेख हसीना फिलहाल भारत में हैं। हसीना सरकार के खिलाफ ब्रिटेन की राजधानी लंदन में बगावत का ब्लू प्रिंट तैयार किया गया था। इस काम में बांग्लादेश की विपक्षी पार्टी बीएनपी के प्रमुख खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान तथा पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई के अधिकारी शामिल थे। सऊदी अरब में भी तारिक रहमान और आईएसआई के अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई। छात्र आंदोलन को हवा देने के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से विद्यार्थियों को भड़काने का काम किया गया। सोशल मीडिया ने माहौल खराब करने के लिए अलग-अलग अकाउंट से पोस्ट किया। खुफिया सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सोशल मीडिया के छह एकाउंट पाकिस्तान से थे। हसीना के इस्तीफे के बाद बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं के घरों, मंदिरों तथा इंदिरा गांधी सांस्कृृतिक केंद्र पर हमला होना बड़ी साजिश का संकेत है। उपद्रवियों ने बंगबंधु स्मारक संग्रहालय में भी तोड़-फोड़ की है, जहां भारत-बांग्लादेश के सांस्कृृतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए कार्यक्रम आयोजित किये जाते थे। इसका अर्थ यह है कि कुछ शक्तियां नहीं चाहती हैं कि भारत और बांग्लादेश के बीच मधुर संबंध हो। शेख हसीना के शासन में दोनों देशों के संबंध काफी प्रगाढ़ रहे थे। उनके शासन में भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवादी गतिविधियों में काफी कमी आई थी। आतंकवादियों एवं कट्टरपंथियों के खिलाफ हसीना सरकार ने कड़े कदम उठाए थे। यही कारण है कि चीन और पाकिस्तान के साथ-साथ कट्टरपंथी ताकतें हसीना को पसंद नहीं कर रही थी। बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं पर हमले को लेकर भारत सरकार को सतर्क रहने की जरुरत है। मोदी सरकार ने इस दिशा में सर्वदलीय बैठक कर अच्छा कदम उठाया है। सरकार ने बांग्लादेश से सटी सीमा पर बीएसएफ के साथ-साथ सेना की तैनाती भी बढ़ा दी है। सरकार को बांग्लादेश की सेना के साथ लगातार संपर्क में रहकर हिंदुओं की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने पर बाध्य करना चाहिए। उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की जरुरत है, ताकि हालात और न बिगड़ पाए।