लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी पकड़ बरकरार रखने के लिए जी-जान से जुटी हुई है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) फिर से सत्ता पर काबिज होने के लिए अपनी जड़ मजबूत करने में लगी हुई है। लोकसभा चुनाव में भाजपा को 33 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि सपा ने 37 सीटों पर परचम फहराया था। अगर लोकसभा के चुनाव परिणाम के दृष्टिकोण से देखा जाए तो राज्य में सपा का पलड़ा भारी है। इस जोर आजमाइश के बीच उत्तर प्रदेश के 10 विधानसभा क्षेत्रों के लिए उपचुनाव होने हैं। इन 10 सीटों में से वर्तमान में पांच सीटों पर सपा का कब्जा है, जबकि बाकी के पांच सीटों पर एनडीए के विधायक हैं। भाजपा 10 सीटों पर जीत दर्ज कर अपना दबदबा कायम करने में पूरी तरह लग गई है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी समस्या पार्टी के अंदर चल रही गुटबाजी को लेकर है। लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश भाजपा में चल रहे मतभेद उभर कर सामने आ गए हैं। राज्य के दोनों उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य तथा ब्रजेश पाठक लगातार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बैठक से अपने को किनारा कर रहे थे। इन लोगों ने भाजपा के केंद्रीय नेताओं के साथ मिलकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शिकायत भी की थी। उत्तर प्रदेश में ऐसा आरोप लगा है कि सरकार और संगठन के बीच तालमेल नहीं है तथा अफसरशाही का बोलबाला है। इस पूरे मामले को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं की बैठक में सरकार और संगठन को मिलकर काम करने का सख्त निर्देश मिला है। केंद्रीय नेताओं द्वारा कड़े निर्देश देने के बाद उत्तर प्रदेश के भाजपा नेताओं के सुर अचानक बदल गए हैं। बगावती मूड में आये उत्तर प्रदेश के दोनों उप-मुख्यमंत्रियों के भी तेवर नरम पड़ गए हैं। अब भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने बिखरे वोटों को बटोरने में जुट गई है। सोमवार को मुख्यमंत्री योगी ने बैठक की, जिसमें पार्टी के सभी शीर्ष नेताओं ने भाग लिया। अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने राज्य के पिछड़े वर्ग के लोगों को बजरंग बली की शक्ति बताया तथा कहा कि विपक्षी पार्टियां विदेशी आक्रांता की तरह हिंदू समाज में फूट डालने का काम कर रही है। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में साढ़े छह लाख बेरोजगार युवकों को नौकरी मिली है, जिसमें 60 प्रतिशत पिछड़े वर्ग से हैं। योगी ने कहा कि सपा के शासन में केवल एक समुदाय को ही तरजीह मिलती थी। भाजपा उत्तर प्रदेश में गैर-यादव पिछड़े वर्ग को अपनी ओर फिर से खींचने में जुट गई है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के लचर प्रदर्शन से ही केंद्र में पार्टी को अपने बलबूते पर स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अस्थिर करने के मूड में नहीं है। इसकार कारण यह है कि उत्तर प्रदेश में योगी लोकप्रियता दूसरे नेताओं के मुकाबले ज्यादा है। अगर योगी की जगह किसी दूसरे नेता को मुख्यमंत्री बनाया गया तो इससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। दूसरा कारण यह है कि योगी के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का पूरा समर्थन है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व योगी पर कोई कार्रवाई कर आरएसएस को नाराज करना नहीं चाहती है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के लचर प्रदर्शन के पीछे आरएसएस की नाराजगी भी एक प्रमुख कारण है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने माता प्रसाद पांडेय को विपक्ष का नेता बनाकर ब्राह्मण वोट बैंक को साधने की कोशिश की है। पीडीए (पिछड़ा, दलित व अल्पसंख्यक) फार्मूले पर चल रही सपा को ब्राह्मण वोट बैंक मिलने से पार्टी की स्थिति और मजबूत हो जाएगी। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में भाजपा और सपा उप-चुनाव से पहले अपनी तैयारी पूरी कर लेना चाहती है। उत्तर प्रदेश का उप-चुनाव सत्ता और विपक्ष के लिए सेमिफाइनल की तरह होने जा रहा है।