फिलवक्त विश्वभर में गर्मी तेजी से ऊपर जा रही है और प्रचंड गर्मी लोगों को परेशान कर रही है। कई शहरों में तापमान 40 डिग्री पार कर चुका है। बढ़ती गर्मी और लू की वजह से लोग बीमार पड़ रहे हैं। मैदानी इलाके में तापमान 40 डिग्री, तटीय इलाकों में 37 डिग्री और पहाड़ी इलाकों में 30 डिग्री अधिकतम तापमान पहुंच गई है। इसका नतीजा यह है कि गर्मी बढ़ने के साथ दोपहर के वक्त बाहर निकलने को मजबूर कामकाजी लोगों, विद्यार्थियों और खुले में रहने वाले लोगों के लिए दिक्कतें बढ़ गई हैं। डॉक्टरों के मुताबिक कुछ सावधानियों के जरिए लोग खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। जानकारों की मानें तो जलवायु परिवर्तन की वजह से पूरी दुनिया में भीषण गर्मी पड़ रही है। इसका असर न सिर्फ इंसानों, बल्कि जानवरों पर भी हो रहा है। मैक्सिको में हाउलर बंदर पेड़ों से गिरकर मर रहे हैं। कनाडा के समुद्री किनारे पर अरबों सीप, झींगे और घोंघे गर्मी की वजह से मर रहे हैं। अर्जेंटीना में एक ही दिन में सैकड़ों पेंगुइन मर गए। तापमान में बढ़ोतरी जीवों की कई प्रजातियों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। इन हालिया घटनाओं ने दुनिया भर में अलग-अलग जीवों की प्रजातियों को प्रभावित किया और इन सबमें एक बात समान है कि वे अत्यधिक गर्मी की वजह से मर रहे हैं। बताते चलें कि औद्योगिक क्रांति के बाद से दुनिया भर में तापमान लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि वातावरण को गर्म करने वाली ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ा है। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्मी बहुत ज्यादा और लंबे समय तक पड़ रही है। वन्यजीव भी इस बढ़ती गर्मी का शिकार हो रहे हैं। हालांकि, जानवरों पर इसका असर कैसे होता है, यह कई बातों पर निर्भर करता है। जैसे- वे कहां रहते हैं, वे लगातार गर्म लहरों का सामना कर रहे हैं या सिर्फ कभी-कभी, और वे किस तरह के जानवर हैं। काफी ज्यादा गर्मी जानवरों के लिए जानलेवा साबित होती है। यह खासतौर पर उन जगहों पर होता है जहां पहले से ही बहुत गर्मी और सूखा रहता है और जानवर इससे ज्यादा गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाते। ऑस्ट्रेलिया इसका एक बड़ा उदाहरण है। वहां हालात बहुत ही ज्यादा खराब हो गए हैं। पक्षी और फ्लाइंग फॉक्स आसमान से मरे हुए गिर रहे हैं। कुछ मामलों में गर्मी से भले ही वन्यजीवों की मौत न हो, लेकिन इससे उनका व्यवहार इस तरह से बदल सकता है कि इसका असर उनकी आबादी पर पड़ सकता है। मरने का एक और बहुत ही खतरनाक तरीका है, जिसमें कोई लाश तक नहीं मिलती है। काफी ज्यादा प्यास लगने, पानी की कमी या गर्मी की वजह से जानवर ज्यादा सक्रिय नहीं हो पाते। वे उस साल बच्चे पैदा नहीं करते हैं। ऐसे में जानवर तो जिंदा रहते हैं, लेकिन उनकी आबादी नहीं बढ़ती है। जब गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है, तो बीटल कम बच्चे पैदा कर पाते हैं। जब जानवर गर्मी या ठंड से बचने के लिए अपना व्यवहार बदलते हैं, तो वैज्ञानिक इसे थर्मल रेगुलेट्री बिहेवियर कहते है। गर्मी के मौसम में छाया में रहना, पानी में जाना या ज्यादा आराम करना शामिल हो सकता है।ऑस्ट्रेलिया में कुआला पेड़ों की ठंडी डालियों को पकड़कर ज्यादा गर्मी से बचते हैं। कैलिफोर्निया में भालू कुछ अलग तरीके से गर्मी से खुद का बचाव करते हैं। जब तापमान बहुत बढ़ जाता है, तो वे आम लोगों के स्विमिंग पूल में नहाने लगते हैं। हालांकि, अब तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि लगातार गर्म हो रही धरती के साथ तालमेल बैठाने के लिए जानवर किस हद तक अपना व्यवहार बदल सकते हैं। जानकार बताते हैं कि हम नहीं जानते कि 100, 1,000 या 10,000 पीढ़ियों के बाद जानवरों की गर्मी के प्रति सहनशीलता बढ़ जाएगी या नहीं? क्या वे तापमान में अचानक होने वाले बदलाव को सहन कर पाएंगे? हालांकि, आसार अच्छे नहीं दिख रहे हैं। ऐसा लगता है कि बहुत से जानवर पहले से ही अपनी शारीरिक क्षमता की अधिकतम सीमा पर जी रहे हैं। एक और बड़ा सवाल यह है कि कौन से जीव बढ़ते तापमान से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। वैज्ञानिकों का मानना है कि बहुत से जीवों को परेशानी होती है, लेकिन पक्षी अक्सर सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
तपती धरती का असर
