पूर्वांचल प्रहरी डेस्क संवाददाता गुवाहाटी : राज्य में लाखों शिक्षित युवा बेरोजगारी के कारण परेशान हैं। राज्य में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या इस समय करीब 30 लाख तक पहुंच गई है। रोजगार पंजीकरण केंद्र के अनुसार पंजीकृत शिक्षित बेरोजगारों में से 17,33,794 पुरुष और 12,61,032 महिलाएं हैं। इसके अलावा तृतीय श्रेणी के 536 बेरोजगारों ने भी रोजगार पंजीकरण केंद्रों पर पंजीकरण कराया है। गौरतलब है कि राज्य में पंजीकृत बेरोजगारों में से 12,15,586 बेरोजगारों ने उच्च माध्यमिक शिक्षा उत्तीर्ण की है। इसके अलावा 10वीं कक्षा वाले 4,66,036, स्नातक डिग्री वाले 6,95,382 बेरोजगार हैं और स्नातकोत्तर डिग्री वाले 1,00,664 बेरोजगार हैं। गौरतलब है कि असम में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या लगभग 30 लाख है, लेकिन उनमें से केवल 4,63,171 ही सरकारी-निजी या स्वरोजगार प्रयासों के माध्यम से आत्मनिर्भर बन पाए हैं।

हालांकि, कुल 25,32,191 पंजीकृत लोग अभी भी रोजगार के लिए तरस रहे हैं। इसलिए, राज्य सरकार सितंबर में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के 14,000 पदों पर भर्ती करने की तैयारी कर रही है, जबकि बेरोजगार आवेदकों की संख्या 18 लाख हैं। मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा ने शुक्रवार को एक फेसबुक लाइव में कहा कि 18 लाख युवाओं ने एडीआरई तृतीय वर्ग के 7,500 पदों और चतुर्थ वर्ग के 4,500 पदों सहित कुल 14,000 पदों के लिए आवेदन किया है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि एडीआरई परीक्षा पुरानी प्रणाली में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर आयोजित की जाएगी। सीएम ने घोषणा की है कि वह पारदर्शिता के आधार पर परीक्षा आयोजित करेंगे, लेकिन विभिन्न लोगों ने सीएम की पारदर्शिता पर संदेह व्यक्त किया है।

फाइट अगैनस्ट इनजस्टिस ऑफ एपीएससी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने पारदर्शी तरीके से परीक्षा आयोजित करने का वादा किया था। यह अच्छी बात है। लेकिन जालुकबाड़ी निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवारों के मामले में पारदर्शिता बनाए रखना मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी है। पिछले दिनों हुई लाखों भर्तियों के संदर्भ में आज भी मेरिट लिस्ट और कट-ऑफ माक्र्स सार्वजनिक नहीं किया गया जिससे परीक्षा की पारदर्शिता क्या है इसे किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। मुख्यमंत्री पर यह भी आरोप है कि जालुकबाड़ी निर्वाचन क्षेत्र में बुजुर्ग उम्मीदवारों की नियुक्ति के संदर्भ में मुख्यमंत्री बिना किसी तर्कसंगत जवाब के सिर्फ यह कहकर ही अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं कि असमिया लड़कों की नियुक्ति हो गई है।

2000 के बाद से सरकार एपीएससी की किसी भी परीक्षा के लिए कट-ऑफ माक्र्स सार्वजनिक किए बिना अभ्यर्थियों की नियुक्ति कर पारदर्शिता का नारा दोहरा रही है। इस बार भी एपीएससी प्रारंभिक परीक्षा के कट-ऑफ अंक सार्वजनिक किए बिना मुख्य परीक्षा आयोजित करने को तैयार है। यह भी राकेश पाल के दौर में हुई एपीएससी परीक्षा घोटाले के बराबर एक संगठित धोखाधड़ी है। यदि भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी रही हो तो फिर परीक्षा के लिए कट-ऑफ अंक, अभ्यर्थियों को उत्तर पुस्तिकाएं आदि उपलब्ध कराने में सरकार क्यों कतरा रही है?