चाय भारत की प्रमुख निर्यात सामग्री है, जिसकी पूरी दुनिया में मांग है। यह उद्योग आज ही नहीं, बल्कि आजादी से पहले से ही फल-फूल रहा है, परंतु इस क्षेत्र में श्रीलंका और केन्या की बढ़ती भागीदारी समय-समय पर हमारी चिंताएं बढ़ाती आ रही हैं। दूसरी ओर इस उद्योग के सरंक्षण के लिए जो उपाय होने चाहिए, वैसे कार्य केंद्र सरकार की ओर से नहीं किये जा रहे हैं। इस उद्योग को आगे बढ़ाने में सबसे महती भूमिका टी बोर्ड की होनी चाहिए, परंतु काफी समय तक अध्यक्ष विहीन बोर्ड ने इस उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं किया,जिनसे चाय उद्योग को आगे बढ़ाने में कामयाबी मिल सके, जबकि अच्छी क्वालिटी की चाय न होने के बावजूद वैश्विक मार्केट में श्रीलंका और केन्या की भागीदारी बढ़ी है, जिसका असर भारत के चाय उद्योग पर भी देखा जा चुका है। इसी बीच समय- समय पर आने वाली आपदाओं ने इस उद्योग को काफी हद तक प्रभावित किया है। ऊपरी असम में आई बाढ़ ने चाय की खेती को बुरी तरह से प्रभावित किया है। परिणामतः भारत में चाय की कीमतें आसमान छू रही हैं और इनके ऊंचे बने रहने की संभावना है, क्योंकि चाय तोड़ने के मौसम के दौरान गर्मी और बाढ़ के कारण प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में उत्पादन में कमी आ रही है। पिछले दशक में चाय की कीमतों में मामूली वृद्धि के बीच बढ़ती उत्पादन लागत से जूझ रहे भारतीय चाय उद्योग को इससे मदद मिल सकती है। मौसम की गंभीर परिस्थितियां चाय उत्पादन को नुकसान पहुंचा रही हैं। मई में भीषण गर्मी और उसके बाद असम में आई बाढ़ के कारण उत्पादन कम हो गया है। सरकार के 20 कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले से भी उत्पादन प्रभावित हुआ है। भारत में मई के दौरान चाय का उत्पादन एक साल पहले की तुलना में 30 प्रतिशत से अधिक गिरकर नौ करोड़ किलोग्राम रह गया। यह एक दशक से भी अधिक समय में सबसे कम मासिक उत्पादन है। असम भारत का आधे से अधिक चाय उत्पादन करता है और जुलाई में आई भीषण बाढ़ से 20 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए। चाय की कीमतों में बढ़ोतरी तब शुरू हुई जब भीषण गर्मी के कारण उत्पादन गिर गया। टी बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार जून के आखिरी सप्ताह में चाय की औसत कीमत बढ़कर 217.53 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई, जो एक साल पहले की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक है। जून महीने के दौरान उत्पादन में सुधार हुआ, लेकिन जुलाई में दोबारा आई बाढ़ के कारण असम के कई जिलों में चाय की कटाई सीमित हो गई। वे इस साल डेढ़ से दो करोड़ किलोग्राम की कमी का अनुमान लगा रहे हैं। भारत ने 2023 में रिकॉर्ड 1.3 अरब किलोग्राम चाय का उत्पादन किया, लेकिन 2024 के दौरान उत्पादन में लगभग 10 करोड़ किलोग्राम की गिरावट आ सकती है। उत्पादन में कमी से कीमतें काफी बढ़ सकती हैं, क्योंकि आर्थिक रूप से तंग और कर्ज में डूबे किसान बड़े खरीदारों से ऊंची कीमतों पर अपनी चाय खरीदने के लिए कह रहे हैं। भारत के कुल चाय उत्पादन का आधे से अधिक हिस्सा जुलाई से अक्तूबर के दौरान तोड़ा जाता है। 2024 में चाय की औसत कीमतें पिछले साल की तुलना में 16 से 20 प्रतिशत अधिक हो सकती हैं, लेकिन इस वृद्धि से चाय के निर्यात में कमी आने की संभावना नहीं है, क्योंकि कीटनाशकों पर प्रतिबंध के बाद कई खरीदार अपनी खरीदारी बढ़ा रहे हैं। वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक 2024 के पहले चार महीनों में भारत का चाय निर्यात पिछले साल की तुलना में 37 प्रतिशत से बढ़कर 9.2 करोड़ किलोग्राम हो गया है। भारत सीटीसी ग्रेड चाय का निर्यात मुख्य रूप से मिस्र और ब्रिटेन को करता है, जबकि पारंपरिक किस्म की चाय को इराक, ईरान और रूस को निर्यात किया जाता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भारत में चाय उद्योग को सरकारी संरक्षण और समय के हिसाब से इसकी वैश्विक मार्केटिंग की जरूरत है तभी इस उद्योग को वैश्विक स्पर्द्धा-प्रतिस्पर्द्धा में रखा जा सकता है।
चाय उद्योग
