स्टार्मर इग्लैंड के प्रधानमंत्री बन गए हैं। सुनक की पार्टी बुरी तरह चुनाव हार चुकी है। इसलिए वह सत्ता से बाहर हो चुकी है। यह ब्रिटेन में एक बड़ा सत्ता परिवर्तन है, इसका असर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर भी होगा। खासतौर पर भारत के साथ अब इंग्लैंड का रिश्ता कैसा रहेगा, इस पर सबकी नजर होगी, क्योंकि सुनक के समय दोनों देशों के बीच काफी गर्मजोशी देखी गई थी। उल्लेखनीय है कि इन चुनावों में हारने वाले पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति की पारिवारिक पृष्ठभूमि की भी वजह से उन्हें लेकर भारत में काफी जिज्ञासा रहती थी और सुनक के कार्यकाल में भारत और ब्रिटेन के संबंधों में काफी तरक्की देखने को मिली, लेकिन दोनों देशों के बीच एक प्रस्तावित मुक्त व्यापार संधि (एफटीए) पर दो सालों से भी ज्यादा से बातचीत चल रही है, लेकिन हस्ताक्षर नहीं हो पाए हैं। अब समीक्षक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या लेबर पार्टी की सरकार के कार्यकाल में इस संधि पर हस्ताक्षर हो पाएगा? पार्टी के शीर्ष नेताओं ने भारत के प्रति अपने रवैए की झलक चुनाव अभियानों के दौरान दी। वैसे खुद स्टार्मर ने ब्रिटेन की भारतीय मूल की आबादी की बढ़ती साख को माना है। ब्रिटेन में भारतीय मूल के करीब 18 लाख लोग रहते हैं और उनका ब्रिटिश अर्थव्यवस्था में छह प्रतिशत से भी ज्यादा का योगदान है। विशेष रूप से भारत को लेकर पार्टी अपने पुराने भूतों से पीछा भी छुड़ाना चाह रही है। सितंबर, 2019 में जब पार्टी विपक्ष में थी तब पार्टी ने एक आपात प्रस्ताव पारित कर कहा कि उस समय पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन और अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को कश्मीर भेजा जाना चाहिए और वह वहां जाकर कश्मीर के लोगों को उनकी किस्मत का फैसला खुद करने का अधिकार दिलाने की कोशिश करेंगे। भारत ने इस प्रस्ताव पर सख्त आपत्ति व्यक्त की थी और इसे बेबुनियाद बताते हुए कहा था कि वह इस विषय पर लेबर पार्टी के साथ बात भी नहीं करना चाहता है। भारत हमेशा से यह कहता रहा है कि कश्मीर उसका अभिन्न अंग है और कश्मीर पर विवाद उसके और पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय समस्या है। इसी तरह कुछ लेबर नेताओं पर खालिस्तान समर्थक होने के भी आरोप लगते रहे हैं, लेकिन पार्टी अब इन विवादों को पीछे छोड़ना चाह रही है। इसी तरह एफटीए को लेकर भी लेबर पार्टी ने सवाल उठाए हैं कि कंजरवेटिव पार्टी ने एफटीए पर हस्ताक्षर करने में देर क्यों की। पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में भी स्पष्ट लिखा हुआ था कि उसे अगर सरकार बनाने का मौका मिलता है तो वो भारत के साथ एक नई सामरिक साझेदारी करेगी, जिसमें एफटीए भी शामिल होगा। उल्लेखनीय है कि किएर स्टार्मर का जन्म 2 सितंबर 1962 को हुआ और वह सरे के ऑक्सटेड में पले-बढ़े। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। उनके पिता एक टूलमेकर थे और उनकी मां नर्स थीं। स्टार्मर ने रेगेट ग्रामर स्कूल से पढ़ाई की जो उनके दाखिले के दो साल बाद एक निजी स्कूल बन गया। उनकी स्कूल की फीस स्थानीय परिषद ने भरी थी। स्टार्मर अपने परिवार के पहले सदस्य थे जिसे यूनिवर्सिटी की शिक्षा मिली। उन्होंने कानून की पढ़ाई के लिए लीड्स और फिर ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। 1987 में स्टार्मर ने बैरिस्टर के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की और मानवाधिकार कानून में विशेषज्ञता हासिल की। बैरिस्टर के रूप में उनकी विदेश यात्राओं ने उन्हें कैरेबियन और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों को देखने का मौका दिया जहां उन्होंने मृत्युदंड का सामना कर रहे कैदियों का बचाव किया। 1990 के दशक के दूसरे हिस्से में उन्होंने मैकलाइबेल आंदोलन के कार्यकर्ताओं के लिए मुफ्त में अपनी सेवाएं दी। सनद रहे कि सर किएर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने जो बड़े वादे किए हैं उनमें ब्रिटेन की स्वास्थ्य व्यवस्था एनएचएस की प्रतीक्षा सूचियों को कम करने के लिए हर हफ्ते 40,000 अधिक अप्वॉइंटमेंट उपलब्ध कराना शामिल है। ब्रिटेन के चुनाव में आप्रवासन एक बड़ा मुद्दा था। लेबर पार्टी ने छोटी नावों के जरिए लोगों की तस्करी को रोकने के लिए सीमा सुरक्षा कमांड स्थापित करने का वादा किया है। साथ ही, कानूनों में सुधार करके 15 लाख नए घर बनाने और नए आवास विकास में पहली बार घर खरीदने वालों को पहली प्राथमिकता देने की योजना का प्रस्ताव रखा है। अब देखना है कि वह अपने वादों पर कितने खरे उतरते हैं।
बदला राज, बदलेगा रिवाज
