किसी भी देश की उन्नति और प्रगति के लिए जनगणना कराना जरूरी है। जनगणना देश में साक्षरता दर, शिक्षा, आवास, घरेलू सुविधाओं, प्रवासन, शहरीकरण, प्रजनन क्षमता, मृत्यु दर, भाषा, धर्म और विकलांगता से लेकर अन्य सामाजिक-सांस्कृृतिक और जनसांख्यिकीय डेटा जैसे उम्र, लिंग और वैवाहिक स्थिति का संग्रह करता है। यह देश के लोगों के डेटा का सबसे बड़ा भंडार होने के साथ-साथ गांव, कस्बे और वार्ड स्तरों पर प्राथमिक डेटा का स्रोत भी है। स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 1948 की जनगणना अधिनियम,अनुच्छेद 246 के तहत एक केंद्रीय विषय और संविधान की सातवीं अनुसूची में सूचीबद्ध किया। वैसे यह अधिनियम केंद्र को किसी विशेष तिथि पर जनगणना करने या एक निर्दिष्ट अवधि के भीतर अपना डेटा जारी करने के लिए बाध्य नहीं करता है। उल्लेखनीय है कि आरजीआई ने अपनी 2021 की जनगणना योजनाओं को 2019 की शुरुआत में ही शुरू कर दिया था,परंतु कोविड के कारण अब तक पूरा नहीं किया जा सका। अब महामारी का असर न्यूनतम  दो वर्ष से अधिक समय बीत चुका है लेकिन जनगणना के मोर्चे पर कोई प्रगति होती नहीं दिख रही है। जनगणना के पहले राज्यों को जिलों, तहसीलों और कस्बों आदि की प्रशासनिक सीमाओं को बंद करने का आदेश दिया जाता है लेकिन इसे नौ बार टाला जा चुका है। ताजा जानकारी के मुताबिक जनगणना कराने को लेकर अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है। जनकल्याण और मुफ्त उपहारों को लेकर सार्वजनिक तौर पर जबरदस्त बहसों तथा जाति जनगणना की मांगों के बीच यह अस्वाभाविक ही है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने अब तक इस महत्वपूर्ण काम को प्राथमिकता नहीं दी जबकि 150 सालों में पहली बार यह काम स्थगित हुआ,वह भी बिना किसी स्पष्ट समय सीमा के। चूंकि ताजा जनगणना डिजिटल रूप में होनी है और इसमें आंकड़ों को इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में भरना है इसलिए इसे अंजाम देना उतना कठिन और समय खपाऊ नहीं होगा जितना कि अतीत में होता रहा है। दूसरी ओर आज यह एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न है कि क्या भाषा, धर्म, व्यवसाय, आय और व्यावसायिक योग्यता की जानकारी के अलावा जाति की जानकारी भी जनगणना में शामिल की जाएगी। यह तब महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और ओडिशा सहित कई राज्यों ने अपनी विधानसभाओं में प्रस्ताव पारित किया है कि 2021 की जनगणना में जाति को शामिल किया जाना चाहिए। बिहार सरकार ने कुछ ही महीने पहले जातिगत सर्वे कराया। उल्लेखनीय है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लीडरशिप में भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 2001 में जातिगत जनगणना कराने से इनकार कर दिया था। यह भी रिकॉर्ड पर रखा जाना चाहिए कि 2018 में नरेंद्र मोदी सरकार ने यह कहा था कि 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले एक ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की जनगणना होगी, लेकिन बाद में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि जातिगत जनगणना संभव नहीं है, परंतु कांग्रेस समेत संपूर्ण इंडिया गठबंधन जनगणना के साथ जातिगत गणना कराने के पक्ष में है, परंतु केंद्र सरकार ने अब तक इसे स्वीकृृति प्रदान नहीं की है। अब देखना है कि इस मामले में केंद्र सरकार अंतिम फैसला क्या लेती है। वैसे केंद्र पर दबाव होगा कि वह जनगणना में जातिगत गणना को भी शामिल करे। ऐसे में जनगणना  से पूर्व पक्ष-विपक्ष के बीच राजनीति तेज होने की पूरी संभावना है।