भारत में धार्मिक महत्व रखने वाले अनेकों मंदिर है और उन सभी की कोई न कोई विशेष मान्यता जरूर है। केदारनाथ से लेकर अयोध्या धाम तक ऐसे कई सुप्रसिद्ध मंदिर है जो देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आपने सुना होगा कि बड़े मंदिरों में गर्भगृह बनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गर्भगृह क्या होता है और गर्भगृह में कौन से नियमों का पालन किया जाता है। तो आइए आज इस विषय की जानकारी लेते हैं। 

गर्भगृह का महत्व : हर मंदिर में गर्भगृह बनाने का प्रावधान जरूर होता है। गर्भगृह ही मंदिर का वो हिस्सा होता है जिसे मंदिर का हृदय कहा जाता है। गर्भगृह में मंदिर की सबसे प्रतिष्ठित मूर्ति की स्थापना की जाती है, यही कारण है कि गर्भगृह का महत्व अधिक बढ़ जाता है। प्राण प्रतिष्ठा के बाद गर्भगृह को बहुत स्वच्छ और पूजित स्थान माना जाने लगता है और माना जाता है कि यहीं पर भगवान वास करते हैं। इसीलिए गर्भगृह में भगवान को भोग, स्नान आदि कराया जाता है। गर्भगृह बनाते समय वास्तु का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। इसके अलावा पूजा करने की विधि और समय भी गर्भगृह के लिए निर्धारित किए जाते हैं ताकि भगवान को विश्राम का समय भी मिल सके और पूजा भी निश्चित समय पर की जा सके। 

गर्भगृह की मान्यता और नियम : मंदिर में बनाया गया गर्भगृह बहुत पवित्र और पूजित स्थान माना जाता है। इसलिए हर किसी को इस स्थान पर जाने की आज्ञा नहीं होती। ऐसा माना जाता है कि गर्भगृह में प्रवेश करने से पहले व्यक्ति को पवित्रता का पूरा ध्यान रखना चाहिए। इस स्थान में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। इसलिए मंदिर के विशेष पंडित ही गर्भगृह में भगवान की पूजा अर्चना करते हैं और भोग अर्पण करते हैं। भक्तों को बाहर से ही भगवान के दर्शन कराए जाते हैं। इसके अलावा गर्भगृह का कपाट भी हमेशा छोटा बनाया जाता है, जिससे हर किसी को झुकना पड़े। ये इस बात का सांकेतिक इशारा है कि हम भगवान के सामने निमित्त मात्र है और भगवान हमारा प्रणाम स्वीकार करें।