तिब्बत को लेकर अमरीका तथा चीन में तनाव चरम पर पहुंच गया है। दोनों ही देश एक-दूसरे के आमने-सामने आ गए हैं। अमरीका के दोनों सदनों ने तिब्बत को लेकर एक विधेयक पास किया है। राष्ट्रपति जो बाइडेन के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन जाएगा। चीन ने अमरीका के राष्ट्रपति को चेतावनी दी है कि वह इस विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं करें। तिब्बत ने चीन की बढ़ती दादागिरी को देखते हुए अमरीका ने नई पहल शुरू की है। इस कानून को लाने का मकसद अमरीका द्वारा तिब्बत के बारे में चलाया जा रहे गलत प्रचार को लगाम देना तथा तिब्बत की समस्याओं के समाधान के लिए तिब्बत की निर्वाचित सरकार एवं चीन के बीच बातचीत शुरू कराना है। इसी सिलसिले में अमरीका का एक प्रतिनिधिमंडल भारत आया हुआ है, जिसमें हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में तिब्बत के धार्मिक गुरू दलाई लामा तथा निर्वाचित सरकार के अन्य नेताओं से भेंट की है। अमरीकी प्रतिनिधिमंडल ने तिब्बत की संसद में भी भाग लिया। प्रतिनिधिमंडल के अमरीका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटिटिव की पूर्व स्पीकर नैंसी पैलोसी तथा विदेशी मामलों से संबंधित कई नेता शामिल हैं। प्रतिनिधियों ने भारतीय अधिकारियों के साथ भी बातचीत की है। मालूम हो कि करीब छह दशक पहले दलाई लामा के नेतृत्व में बड़ी संख्या में तिब्बतियों ने चीनी अत्याचार से बचने के लिए भारत में प्रवेश किया था। उसके बाद भारत ने धर्मशाला में इन तिब्बतियों को जगह दी। चीन के विदेश विभाग के प्रवक्ता ने इस पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा है कि तिब्बत चीन का आंतरिक हिस्सा है। अमरीका को इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। अमरीकी प्रतिनिधियों के दलाई लामा से मिलने पर चीन काफी नाराज है। पहले तिब्बत अलग देश था। भारत की सीमा तिब्बत से लगती थी। लेकिन चीन ने जबर्दस्ती तिब्बत पर हमला कर कब्जा कर लिया तथा वहां की संस्कृृति को बदलने पर तुला हुआ है। चीन की बढ़ती ताकत के सामने दूसरे देश तिब्बतियों का साथ नहीं दे रहे हैं। अब अमरीका तिब्बतियों को उनका अधिकार दिलाने के लिए सामने आया है। अमरीका चाहता है कि भारत भी उसकी पहल में सहयोग करे। भारत के लिए चीन पर दबाव डालने के लिए एक अच्छा मौका है। चीन हमेशा भारत की सीमा में घुसपैठ करने की कोशिश करता रहा है। ड्रैगन ने अब तक अरुणाचल प्रदेश के 30 जगहों का नाम बदलकर चीनी भाषा में रख लिया है। भारत सरकार पहले से ही इसके जवाब में चीन के 30 जगहों के नाम भारतीय भाषा में रखने का विचार कर रही है। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा ने भी चुनाव प्रचार के दौरान यह कहा था कि चीन की हड़कत के जवाब में भारत को चीन के 60 क्षेत्रों के नाम भारतीय भाषाओं में रखकर करारा जवाब देना चाहिए। भारत को अमरीका की तिब्बत नीति को आगे बढ़ाने में सहयोग करना चाहिए। चीन एक ऐसा देश है जो प्रेम एवं भाइचारे तथा शांति की भाषा नहीं समझता है। इसलिए यह जरूरी है कि चीन को उसी की भाषा में जवाब दिया जाए। भारत चीन के पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक एवं सामरिक संबंध बढ़ाकर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। चीन लगातार भारत को घेरने के लिए हमारे पड़ोसी देशों को कर्ज जाल मेंफंसाकर अपना मोहरा बना रहा है। अक्साई चीन तथा अरुणाचल प्रदेश के कुछ भाग अभी भी चीन के कब्जे में हैं। अब भारत के पास सुनहरा मौका है कि तिब्बत पर दबाव बढ़ाकर चीन को सीमा समस्या के समाधान के लिए मजबूर करे। ताइवान के मुद्दे पर पहले ही चीन पश्चिमी देशों के निशाने पर है। तिब्बत पर एक मोर्चा खोलने से उसकी परेशानी बढ़ेगी जो भारत के हित में है।
अमरीका-चीन में तनाव
