केंद्र में नई सरकार बन गई है। वाराणसी से सांसद नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं। इस नई सरकार से समाज के हरेक वर्ग को काफी उम्मीदें हैं और सभी चाहते हैं कि नई सरकार हर क्षेत्र में बेहतर कार्य करे। युवा चाहते हैं कि नई सरकार रोजगार पर विशेष रुप से ध्यान दे और भारी पैमाने पर उन्हें सरकारी नौकरी मिले तो दूसरी ओर निजी क्षेत्र में भी रोजगार की उपलब्धता को बनाए रखना नई सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। दूसरी ओर नई सरकार से व्यापारियों को भी काफी उम्मीदें हैं। वे चाहते हैं कि जीएसटी के मामले में सरकार लचीला रुख अपनाए और उनके सामने आ रहीं परेशानियां दूर हों। उल्लेखनीय है कि कोरोना काल में व्यापार पर जो असर पड़ा, वह अब तक बरकरार है। इस संदर्भ में पूर्वोत्तर के सबसे बड़े बिजनेस हब फैंसी बाजार के व्यापारियों का कहना है कि कोरोना के पहले का बाजार अब तक वापस नहीं आया है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों को व्यापारियों के लिए सरल और सुलभ बनाए। साथ ही उन्हें इंस्पेक्टरी राज से मुक्त किया जाए। दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर होने वाले व्यापार पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इस कड़ी में कहा जा सकता है कि कोई भी देश बिना निर्यात में महत्वपूर्ण इजाफा किए तेज वृद्धि हासिल नहीं कर सकता। निर्यात में इजाफा विदेशी बचत पर भारत की निर्भरता कम कर देगा और बढ़ती श्रम शक्ति के लिए रोजगार तैयार करेगा। इससे घरेलू मांग को गति प्रदान करने में मदद मिलेगी। अगर तुलना की जाए तो भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। बहरहाल वैश्विक वस्तु निर्यात में उसकी हिस्सेदारी की बात करें तो विश्व व्यापार संगठन के आंकड़ों के अनुसार 2023 में यह केवल 1.8 फीसदी थी। अमरीका और चीन के आंकड़ों से तुलना करें तो वहां यह क्रमशः 8.5 और 14.2 फीसदी थी। भारत का लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह वैश्विक वस्तु निर्यात में अपनी हिस्सेदारी में इजाफा करे। वर्ष 2023-24 में भारत के वस्तु निर्यात में 3.09 फीसदी की ऋणात्मक वृद्धि दर्ज हुई। भारत को निरंतर उच्च निर्यात वृद्धि हासिल करने के लिए अपनी व्यापार नीति की व्यापक समीक्षा करनी होगी। इसके अलावा भारत किसी बड़े क्षेत्रीय या प्राथमिकता वाले व्यापार समझौते से भी नहीं जुड़ा है। अगर उसका ऐसा कोई जुड़ाव होता तो कच्चे माल की लागत में कमी आती और भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखला का हिस्सा बनने में मदद मिलती। कभी चाय, जूट और मसाले भारत के प्रमुख उद्योग माने जाते थे। ये तीनों उद्योग स्वतंत्रता से पहले से फल-फूल रहे हैं, परंतु दुर्भाग्यवश है कि आज ये तीनों उद्योग अपनी गुणवता और अस्तित्व खोते जा रहे हैं, जबकि इन पर आज भी भारत के करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। आजादी के बाद इन उद्योगों को जिस स्तर पर फलना- फूलना चाहिए, उस तरह ये नहीं फल-फूल रहे हैं। आज भारत का जूट उद्योग संकट में है। खासतौर पर जब से केंद्र सरकार ने एफसीआई में जूट की बोरी की जगह प्लास्टिक के बैग को प्राथमिकता दी है, तब से पश्चिम बंगाल के जूट मिल प्रभावित हो रहे हैं और मजदूरों को लगातार काम नहीं मिल रहे हैं। जानकार कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में 2019 के लोकसभा चुनाव में 2024 की जगह बेहतर प्रदर्शन किया था,परंतु इस बार भाजपा अपने पुराने प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाई, इसकी वजह जूट मिल की बदतर स्थिति है, जिससे मिल के मजदूर मोदी सरकार से नाराज हैं। परिणामतः भाजपा जूट मिल इलाके में इस बार बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकी। दूसरी ओर भारत का चाय उद्योग दिनों- दिन अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में केन्या और श्रीलंका की प्रतिस्पर्द्धा का मुकाबला करने में विफल है, परिणामतः अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय चाय की मांग घटती जा रही है। इसी कड़ी में पिछले दिनों भारतीय कंपनियों के मसालों को कुछ देशों ने प्रतिबंधित कर दिया,वह निहायत चिंता का विषय है। इसलिए नई सरकार को चाहिए कि उसे जूट, चाय और मसाला उद्योग को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर अपनी गुणवत्ता और पहचान बनाए रखने में मदद करे।
बड़ी उम्मीद
