हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी को बटुक भैरव जयंती मनाई जाती है। इस बार बटुक भैरव जयंती 16 जून, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान शिव ने भैरव के रूप में अवतार लिया था। श्री भैरवनाथ साक्षात रुद्र हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि वेदों में जिस परमपुरुष का नाम रुद्र है, तंत्र शास्त्र में उसी का भैरव के नाम से वर्णन हुआ है। शिवपुराण में भैरव को भगवान शंकर का पूर्णरूप बतलाया गया है। विद्वान लोग भगवान शंकर और भैरवनाथ में कोई अंतर नहीं मानते हैं। वे इन दोनों में अभेद दृष्टि रखते हैं। बटुक भैरव भगवान शिव का बाल रूप एवं भयानक, विकराल और प्रचंड रूप है। बटुक भैरव की पूजा करने से शत्रुओं और विरोधियों का कोई भी षड्यंत्र सफल नहीं होता है। प्राचीन काल की बात है।
आपद नाम का एक राक्षस था। आपद का अत्याचार बहुत बढ़ गया था। तीनों लोकों के देवी-देवता और पृथ्वी पर मनुष्य उसके अत्याचार से परेशान थे। आपद को वरदान था कि कोई देवी-देवता उसे नहीं मार सकते। सिर्फ कोई पांच साल का बच्चा ही उसका वध कर सकता है। अपनी समस्या लेकर तब देवी-देवता शिवजी के पास गए। शिव की कृपा और देवी-देवताओं की शक्ति से पांच साल के बालक के रूप में शिव की उत्पत्ति हुई। बालक का नाम बटुक भैरव रखा गया। इसी बालक ने आपद नाम के राक्षस का वध किया।
इस बार बटुक भैरव जयंती रविवार को है, इसलिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि रविवार को भगवान बटुक भैरव की साधना करने पर साधक को बल, बुद्धि, विद्या, मान-सम्मान आदि की प्राप्ति होती है। ज्योतिष के अनुसार राहु-केतु से संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए बटुक की साधना अत्यंत फलदायी है। बटुक जयंती के दिन भैरव बाबा की सवारी श्वान यानि कुत्ते की पूजा करने और उसे दूध पिलाने से भगवान प्रसन्न होते हैं। इससे जीवन में आने वाली मुसीबतों से बचाव होता है। बटुक जयंती के दिन काले कुत्ते की पूजा फलदायी मानी जाती है। इसलिए इस दिन उसे सरसों के तेल लगी हुई रोटियां खिलाएं।