प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रियों के विभागों का बंटवारा कर दिया है। विभाग बंटवारे के साथ ही सभी मंत्रियों ने अपने-अपने विभागों का दायित्व संभाल लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद दस जून को ही अपना कार्यभार संभालने के साथ ही दो महत्वपूर्ण फैसले किए। पहला फैसला किसान सम्मान निधि की 17वीं किस्त जारी करने तथा दूसरा फैसला प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत तीन करोड़ घरों के निर्माण के लिए सरकारी सहायता को मंजूरी देने का है। प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों से कहा है कि वे अनावश्यक बयानबाजी से बचते हुए अपने काम पर ध्यान दें। प्रधानमंत्री ने पहले ही अगले 125 दिन के लिए विभिन्न मंत्रालयों के लिए रूपरेखा तय कर दी है। विपक्षी दलों द्वारा पहले यह आवाज उठाई जा रही थी कि इस बार की मोदी सरकार तेलुगू देशम पार्टी तथा जनता दल यू के इशारे पर काम करने पर मजबूर होगी। अनेक राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना था कि सत्ता की असली चाभी तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू तथा जदयू के प्रमुख नीतीश कुमार के हाथ में होगी। लेकिन मंत्रियों के विभागों के बंटवारे पर गौर करने से यह पता चलता है कि भाजपा कहीं से भी अपने सहयोगी दलों के दबाव में नहीं आई। ऊपर के शीर्ष पदों पर भाजपा के मंत्री ही काबिज हैं। सहयोगी दलों को उनकी संख्या के आधार पर मंत्रियों की संख्या एवं विभाग वितरित किए गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2019 की तरह ही गृह एवं सहकारिता मंत्रालय अमित शाह को, रक्षा मंत्रालय राजनाथ सिंह को, विदेश मंत्रालय जयशंकर को, वित्त मंत्रालय निर्मला सीतारमण को, सड़क परिवहन मंत्रालय नितिन गडकरी को तथा रेल एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय अश्विनी वैष्णव को दिया गया है। कृृषि जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा ऊर्जा एवं शहरी विकास मंत्रालय हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को दिया गया है। शिक्षा मंत्रालय भी पहले की तरह धमेंद्र प्रधान को दी गई है। इन सब के बावजूद भाजपा के सहयोगी दलों की तरफ से कोई विरोध नहीं किया जा रहा है। केवल शिवसेना (शिंदे गुट) तथा एनसीपी (पवार गुट) की तरफ से थोड़ी नाराजगी दिखाई गई है क्योंकि उनके सांसदों को कैबिनेट मंत्री का पद ऑफर नहीं किया गया। हालांकि महाराष्ट्र की दोनों पार्टियों ने उम्मीद जाहिर की है कि भविष्य में इस पर जरूर विचार होगा। पहले ऐसी उम्मीद थी कि तेलुगू देशम पार्टी के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ज्यादा विभागों की मांग करेंगे, लेकिन विभागों के बंटवारे के दौरान ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला। चंद्रबाबू नायडू एवं नीतीश कुमार ने शपथ ग्रहण समारोह में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। तेदेपा एवं जनता दल यू को मालूम है कि अगर उन लोगों ने सरकार से समर्थन वापस लिया तो भाजपा कुछ छोटे दलों एवं निर्दलीय की सहायता से सरकार बना लेगी। दूसरी तरफ तेदेपा को यह मालूम है कि आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी विजय ने प्रधानमंत्री पहल का भी योगदान है। इसी तरह बिहार में जनता दल यू को मिले 12 सीटों में भी प्रधानमंत्री की चुनावी रैली का खासा योगदान है। बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) पूरी तरह मोदी के साथ खड़ी है। जीतन राम मांझी भी कैबिनेट मंत्री का पद मिलने से गदगद हैं। आंध्र प्रदेश की जनसेना पार्टी भी पूरी तरह सरकार के साथ है। नीतीश कुमार को यह मालूम है कि भाजपा और जदयू गठबंधन के कारण ही यह संख्या बल प्राप्त हुआ है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस तथा वामपंथी पार्टियों के गठजोड़ के बावजूद राजद को केवल चार सीटें मिली है जबकि छोटी क्षेत्रीय पार्टी लोजपा पांच जगहों पर विजय दर्ज की है। इसी तरह महाराष्ट्र में शिवसेना (शिंदे गुट) तथा एनसीपी (पवार गुट) को भी मालूम है कि भाजपा के सहयोग बिना अगला विधानसभा चुनाव जीतना कठिन होगा। प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल के गठन एवं विभागों के बंटवारे के दौरान पहले के मंत्रियों के प्रदर्शन, जातीय समीकरण एवं क्षेत्रीय स्थिति का पूरा ख्याल रखा है। मंत्रिमंडल को देखकर बिल्कुल ऐसा नहीं लगता है कि मोदी सरकार किसी दबाव में है।
मंत्रिमंडल में भाजपा का वर्चस्व
