पिछले कुछ वर्षों से चीन और ताइवान में चल रहा विवाद दुनिया में एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। चीन अपने वन चाइना पॉलिसी के तहत ताइवान को अपने साथ मिलाना चाहता है जबकि ताइवान की सरकार तथा वहां की जनता अपने सम्प्रभुता को बनाए रखना चाहती है। चीन की विस्तारवादी नीति से चीन के सभी पड़ोसी देश परिचित हैं। जमीन हथियाने की उसकी भूख खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। ताइवान के समर्थन में सुपर पावर अमरीका सहित ड्रैगन के कई पड़ोसी देश खड़े हैं। रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन की चीन यात्रा के बाद ड्रैगन ने अचानक सैन्य अगयास के नाम पर ताइवान की घेराबंदी कर दी है। चीन ने ताइवान के सीमा के पास स्थित डोंगियन द्वीप एवं फुजियान प्रांत में बड़ी संख्या में एंटी सबमरीन, एयर क्राफ्ट तथा कोस्ट गार्ड के जहाजों को तैनात कर युद्धाभ्यास किया है। इसका मुख्य उद्देश्य अपनी सामरिक शक्ति दिखा कर ताइवान को दबाव में लाना है। चीन के 49 फाइटर जेट भी अपना करतब दिखा रहे हैं। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी जमीन, आसमान व समंदर सभी क्षेत्र में युद्धाभ्यास कर रह है।
ताइवान में नए राष्ट्रपति लाई चिंग के सत्ता में आने के बाद चीन बौखला गया है। दूसरी तरफ ताइवान अपनी अखंडता एवं सम्प्रभुता की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। ताइवान में अमरीका के एयर डिफेंस सिस्टम सहित कई खतरनाक मिसाइलें तैनात की गई हैं। लाई चिंग ने कहा है कि उनका देश अपनी अखंडता और स्वतंत्रता की रक्षा करने को पूरी तरह प्रतिबद्ध है। चीन का मानना है कि अमरीका अभी रूस-यूक्रेन युद्ध तथा इजरायल-हमास युद्ध में फंसा हुआ है। दूसरी बात यह है कि अमरीका में इस वर्ष के अंत तक राष्ट्रपति का चुनाव होना है। ऐसी स्थिति में चीन का मानना है कि हम ताइवान पर कब्जा कर सकते हैं। लेकिन अमरीका भी स्थिति की गंभीरता से वाकिफ है। इसलिए वह दक्षिण चीन सागर एवं उत्तर चीन सागर में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। अमरीका का सबसे बड़ा युद्धपोत यूएस रोनाल्ड रीगन सबसे से ही दक्षिण चीन सागर में तैनात है। इसके अलावा जापान, फिलिपींस एवं दक्षिण कोरिया में अमरीका के नवसैनिक बेस हैं। जहां युद्धं विमान एवं खतरनाक परमाणु पनडुब्बियां आदि तैनात हैं।
जापान के पास गुआन में अमरीका के सातवीं फ्लीट का मुख्यालय भी है। अगर अमरीका चाहेगा तो वह दक्षिण चीन सागर एवं उत्तरी चीन सागर के आसपास के अपने नौसैनिक अड्डों से चीन पर हमला कर सकता है। ताइवान के अंदर भी अभी अमरीका के लगभग 200 जवान तैनात हैं जो ताइवानी सेना को प्रशिक्षण दे रहे हैं। चीन ने ताइवान के मुद्दे पर अमरीका सहित दुनिया के देशों को चेतावनी देते हुए कहा है कि दूसरे देशों को ताइवान के मुद्दे से दूर रहना चाहिए। भारत परोक्ष रूप से ताइवान के साथ खड़ा है।
यही कारण है कि चीनी राजदूत द्वारा समर्थन करने की अपील के बावजूद भारत वन चाइना पॉलिसी पर मौन साधे हुए है, जो चीन भारत की भूमि पर कब्जा जमाए हुए हैं तथा वह अरुणाचल के बड़े हिस्से को अपना हिस्सा मानने के लिए साजिश रचता रहा है, उसे भारत से वन चाइना पॉलिसी पर समर्थन करने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। पाकिस्तान के आतंकियों को संयुक्त राष्ट्र के मंच से अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित करने की भारत की पहल का भी चीन विरोध करता रहा है। ऐसी स्थिति में भारत को ताइवान का समर्थन करना चाहिए। अमरीका ने पहले ही क्वाड का गठन कर चीन पर नकेल कसने के लिए पहल शुरू कर दी है। इसके अलावा अमरीका ने ब्रिटेन व आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर एक नया सामरिक गठबंधन बनाया है। कुल मिलाकर ताइवान के मुद्दे पर दुनिया तीसरे युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। चीन पर नकेल कसने के लिए दुनिया के देशों को एकजुट होने की जरूरत है।