ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी, विदेश मंत्री अमीर अब्दोल्लाहियन तथा सात अन्य लोगों की पिछले शुक्रवार को हेलीकाप्टर दुर्घटना में मौत हो गई। यह घटना पूर्वी अजरबैजान जिले के जोलफा के नजदीक के घटी जो क्षेत्र तेहरान से 600 किमी की दूरी पर है। इस घटना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। ईरान ने अपने राष्ट्रपति के शोक में पांच दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया है, जबकि भारत भी 21 मई को राष्ट्रीय शोक का पालन कर रहा है। रईसी ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के बाद सबसे मजबूत नेता माने जाते थे। ऐसा कहा जा रहा था कि खामेनेई के बाद वे ईरान के सर्वोच्च नेता बनने के सबसे मजबूत दावेदार थे। खामेनेई के पुत्र भी सर्वोच्च नेता बनने की रेस में हैं। इस तरह की दुर्घटना से कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। एक तबके का मानना है कि इस घटना के पीछे इजरायली गुप्तचर एजेंसी मोसाद का हाथ हो सकता है। लेकिन इजरायल ने इस घटना के तुरंत बाद इस तरह के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।
कुछ लोगों का कहना है कि यह घटना ईरान की आतंरिक राजनीति का परिणाम हो सकता है, क्योंकि वहां के सर्वोच्च नेता खामेनेई के पुत्र भी सर्वोच्च नेता बनने के दौर में हैं। तीसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि हो सकता है कि मौसम के खराब होने के कारण हेलीकाप्टर दुर्घटना का शिकार हो गया हो। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि उस काफिले में शामिल तीन हेलीकाप्टरों में दो हेलीकाप्टर सुरक्षित पहुंच गए जबकि राष्ट्रपति व विदेश मंत्री को ला रहा हेलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। ईरान भी अमरीका के निशाने पर था। ऐसी स्थिति में रईस के साथ हुई घटना अमरीकी ऐंगल से इनकार नहीं किया जा सकता। रईसी की मौत भारत के लिए एक बड़ा झटका है। रईसी की पहल से ही भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर हाल ही में बड़ा समझौता हुआ है।
चाबहार पोर्ट व्यापारिक एवं सामरिक दोनों दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद चाबहार के शाहिद बेहेश्ती पोर्ट का दस वर्ष के लिए पूरा संचालन भारतीय कंपनी के हाथ में आ गया है। हालांकि वर्ष 2003 में ही चाबहार पोर्ट को लेकर भारत और ईरान के बीच चर्चा हुई थी। 2017 में पोर्ट के टर्मिनल का निर्माण किया गया। उसके बाद इसका संचालन भारत कर रहा था। लेकिन 10 वर्ष के लिए इस पोर्ट का संचालन भारत के पास आने से भारत उस पोर्ट को विकसित करने के लिए अपनी तरफ से निवेश आसानी से कर सकेगा। इस पोर्ट के संचालन से भारत की पहुंच अफगानिस्तान, मध्य पूर्व के देशों के साथ-साथ यूरोप तक हो जाएगी। भारत का व्यापार रूस के साथ भी आसानी से होने लगेगा। चीन और पाकिस्तान के दबाव के बावजूद रईसी के शासन में भारत और ईरान के संबंध घनिष्ठ रहे हैं।
ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई चाबहार पोर्ट भारत को दस वर्ष के लिए देने के मुद्दे पर अनिश्चितता के स्थिति में थे। लेकिन रईसी ने अपनी राजनीतिक सुझबुझ से साहसी फैसला लिया। इससे ईरान की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। रईसी की छवि एक कट्टरपंथी नेता के रूप में जानी जाती थी। यही कारण है कि उनकी मौत के बाद ईरान में उदारवादी तत्वों ने जश्न मनाया। अब अगला कुछ महीने ईरान के लिए चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि वहां के संविधान के अनुसार 50 दिन के भीतर राष्ट्रपति का चुनाव करना होता है। फिलहाल के वहां के उप राष्ट्रपति मोहम्मद मुखबर को कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया है। रईसी अपने शासन में ही इजरायल-हमास के बीच युद्ध शुरू हुआ है। ईरान ने इजरायल पर हमला भी किया था। रईसी की मौत से अमरीका विरोधी लॉबी को भी झटका लगा है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी रईसी की मौत पर गहरा दुख व्यक्त किया है तथा कहा है कि रूस ने अपना सच्चा मित्र खो दिया। कुल मिलाकर रईसी की मौत से ईरान में सत्ता संघर्ष का दौर शुरू हो सकता है। इसका असर मुस्लिम देशों पर भी पड़ सकता है।