इन दिनों देश आम चुनाव से गुजर रहा है। ऐसे मौके पर पूरे देश में जश्न जैसा माहौल है। वैसे लोकतंत्र का तकाजा भी है कि आम आदमी आम चुनाव के मौके पर इसे जनतंत्र के पर्व के रूप में अपनाए और अपनी भागीदारी शत-प्रतिशत सुनिश्चित कराए। ऐसे में सवाल है कि क्या इस बार ज्वलंत मुद्दों पर चुनाव लड़ा जा रहा है या भावनात्मक और धर्म आधारित राजनीति ही दिल्ली में बनने वाली नई सरकार की रूपरेख तय करेगी? महंगाई, बेरोजगारी, सूखा, बाढ़, भूकटाव, भूस्खलन, शुद्ध पेयजल की कमी, डेंगू, मलेरिया और जापानी बुखार प्रमुख समस्याएं हैं, जिनसे देश लगातार लड़ रहा है। पिछले  दो  साल पहले कोरोना से बड़ी संख्या में लोग मर गए। बाढ़ और भूस्खलन के कारण भी कई दर्जन लोग असमसय ही काल के गाल में समा गए। मलेरिया और जापानी बुखार से भी मौतें हो रही हैं। पेयजल समस्या यहां की प्रमुख समस्याओं में एक है। खासतौर पर गुवाहाटीवासियों के लिए शुद्ध पेयजल की उपलब्धता सबसे बड़ी मांग है, जिसे अब तक की किसी सरकार ने पूरी नहीं की। याद रहे कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुवाहाटी में पेयजल की दुर्दशा का जिक्र किया था, परंतु उसके बाद दो लोकसभा चुनाव कराए गए, परंतु पेयजल की समस्या ज्यों की त्यों है। दूसरी ओर असम में हर बार बाढ़ आती है, जिसकी चर्चा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होती है, परंतु केंद्र सरकार ने इस संकट की घड़ी में ऐसा कुछ नहीं किया,जिसका जिक्र यहां किया जा सके। इस साल भी बाढ़ के कारण हजारों करोड़ की फसलें नष्ट हो गर्इं। ऐसी स्थिति में पशुधन को बचाना बहुत बड़ी समस्या है। पिछले दो साल पहले गुवहाटी सहित पूरा राज्य कोरोना संकट से गुजर रहा था, इससे राज्य में डेढ़ लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए थे। उस समय सरकार पर कमीशन राज चलाने का आरोप लगा था। क्या आपदा को अवसर बनाने का इससे बेहतर और तरीका नहीं है। उल्लेखनीय है कि गोगोई सरकार के पतन का प्रमुख कारण कथित रूप से गृह विभाग से लेकर पान तक की खरीद-फरोख्त तक में सिंडिकेट का होना था, परंतु लग रहा कि वर्तमान राज्य सरकार विगत सरकार से सबक नहीं लेना चाहती। आज कोयला, गोरू, बालू-पत्थर, मछली, सब्जी सहित अन्य क्षेत्रों में सिंडिकेट का बाजार गर्म है। कोयला सिंडिकेट में सत्ताधारी पार्टी के कई विधायकों पर सिंडिकेट में शामिल होने के आरोप लग चुके हैं। ऐसे में सत्ता के मुखिया की भ्रष्टाचार पर शून्य सहनशीलता की बातें अपना असर खो देती हैं। असम में भाजपा ने सरकार बनने से पहले बड़े नदी बांध को न बनने देने, राज्य के छह समुदायों के जनजातिकरण, बड़ी संख्या में युवक-युवतियों को रोजगार देने, बांग्लादेशियों को राज्य से बाहर करने, बांग्लादेश को राज्य की मिट्टी नहीं देने, चाय मजदूरों को प्रतिदिन 351 रुपए मजदूरी देने जैसे वादे किए थे, परंतु इन पर अब तक अमल नहीं हो सका और कुछ फैसले वादे के विपरीत किए गए। फिलहाल चाय उद्योग, उसके संचालक और कर्मचारी कठिन दौड़ से गुजर रहे हैं, परंतु केंद्र सरकार और टी बोर्ड उनकी समस्या के समाधान में विफल है।  उल्लेखनीय है कि चुनाव के ऐन मौके पर राज्य की या देश की ज्वलंत समस्याएं चुनावी मुद्दा नहीं बन सकीं,यह अलग बात है कि मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा ने चुनाव के ऐन मौके पर किसी भी विवादास्पद मुद्दे को आगे बढ़ने नहीं दिया। उन्होंने पूरे चुनाव अभियान के दौरान आम लोगों के कल्याण की बातें की और इस मामले में अब तक सरकार ने क्या किया और आगे क्या करने की योजना है, उस पर अपने चुनाव प्रचार को फोकस किया। सच तो यह है कि मुख्यमंत्री हिमंत का चुनाव अभियान जितना संयमित और संतुलित था, उतना भाजपा ने अन्य नेताओं का नहीं रहा,यह असम के लिए बड़ी बात है।