भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में विशेष माह के विशेष तिथि पर व्रत उत्सव मनाने की परम्परा है। इसी क्रम में अक्षय पुण्य फल की कामना के लिए मनाए जाने वाला पर्व अक्षय तृतीया वैशाख शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि के दिन हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार अक्षय तृतीया से ही त्रेतायुग का प्रारम्भ हुआ था। इस दिन भगवान परशुराम जी भगवान विष्णु के अंश के रूप में अवतरित हुए थे, जिसके फलस्वरूप भगवान परशुराम जयंती मनाने की पौराणिक परंपरा है। प्रख्यात् ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि अक्षय पुण्यफल की कामना के संग मनाए जाने वाला पर्व अक्षय तृतीया 10 मई, शुक्रवार को मनाया जाएगा।
वैशाख शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि 9 मई, गुरुवार को अद्र्धरात्रि के पश्चात 4 बजकर 19 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन 10 मई, शुक्रवार को अद्र्धरात्रि के पश्चात 2 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। रोहिणी नक्षत्र 9 मई, गुरुवार को दिन में 11 बजकर 56 मिनट से 10 मई, शुक्रवार को दिन में 10 बजकर 47 मिनट तक रहेगा, तत्पश्चात मृगशिरा नक्षत्र प्रारम्भ हो जाएगा। 10 मई, शुक्रवार को संपूर्ण दिन तृतीया तिथि होने से अक्षय तृतीया का पर्व इसी दिन मनाया जाएगा। इस दिन भगवान श्री लक्ष्मीनारायण की प्रसन्नता के लिए व्रत एवं उपवास रखकर यह पर्व मनाने की धार्मिक व पौराणिक मान्यता है।
'अक्षय' का वास्तविक अर्थ है, जिसका कभी क्षय न होता हो। इस तिथि के दिन किए गए समस्त कार्यों का प्रभाव अक्षय हो जाता है। ज्योतिषविद् ने बताया कि अक्षय तृतीया को 'अबूझ' मुहूर्त की मान्यता प्राप्त है। इस दिन नवीन व्यवसायिक प्रतिष्ठान के शुभारम्भ, मांगलिक आयोजन, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत, नामकरण संस्कार, वैवाहिक एवं समस्त मांगलिक व धार्मिक आयोजन की परंपरा है। मो. : 09335414722