लोकसभा चुनाव के दौरान टिकट के बंटवारे तथा गठबंधन को लेकर दूसरी राजनीतिक पार्टियों की तरह कांग्रेस में भी बगावती सुर उभरने लगे हैं। चुनाव के वक्त नेताओं का पाला बदलना आम बात हो गई है। दिल्ली में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी (आप) के साथ चुनावी तालमेल कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को पटखनी देने के लिए रणनीति बनाई है। समझौते के तहत दिल्ली के सात सीटों में से चार पर आप तथा तीन पर कांग्रेस उम्मीदवार खड़ा करेगी। इसको लेकर प्रदेश कांग्रेस के नेता काफी दिनों से नाराज चल रहे थे। नाराजगी की सीमा उस वक्त पार कर गई जब दिल्ली की कांग्रेस कोटे की तीन में से दो सीटों पर बाहरी नेता को टिकट दे दिया गया। कन्हैया कुमार और उदित राज को दिल्ली की दो लोकसभा सीटों से उम्मीदवार बनाया गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं दिल्ली इकाई के अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को शनिवार को भेजे अपने इस्तीफे में लवली ने कहा कि वर्तमान में मैं लाचार महसूस कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की प्रदेश इकाई आप के साथ गठबंधन करने के खिलाफ थी। प्रदेश इकाई ने काफी मेहनत कर कांग्रेस पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए काफी मेहनत की थी। उन्होंने लिखा है कि आप ने कांग्रेस के ऊपर पहले कई आपत्तिजनक आरोप लगाये थे। वर्तमान में उनकी पार्टी के कई नेता भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं। कुछ दिन पहले ही दिल्ली के पूर्व मंत्री तथा एआईसीसी के सदस्य राजकुमार चौहान ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। वर्तमान स्थिति यह है कि कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ता सरेआम कन्हैया कुमार का विरोध कर रहे हैं। इस तरह की स्थिति देश के कई जगहों पर देखने को मिल रही है। मध्यप्रदेश के इंदौर संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार अक्षय कांति बम ने अचानक अपना नाम वापस ले लिया है। यहां से कुल 23 उम्मीदवार मैदान में हैं। भाजपा के शंकरलाल वानी प्रतिद्वंद्विता कर रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अपना नामांकन वापस लेने के बाद अक्षय कांति बम भाजपा में शामिल हो गए। इसी तरह खजुराहो संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस उम्मीदवार के नामांकन रद्द होने से कांग्रेस को निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन करना पड़ रहा है। गुजरात के सूरत संसदीय क्षेत्र से सभी उम्मीदवारों के मैदान से हटने के कारण भाजपा को पहले ही जीत मिल चुकी है। अभी तक कांग्रेस के सैकड़ों नेता अपनी पार्टी को छोड़कर भाजपा का दामन थाम चुके हैं। इसमें लगभग एक दर्जन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। कांग्रेस का एक बड़ा तबका राहुल गांधी की कार्यशैली से नाराज चल रहा है। कई राज्यों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की बी टीम बनकर रह गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, दिल्ली जैसे राज्यों में कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों की शर्तों पर समझौता करना पड़ा है। पश्चिम बंगाल तथा पंजाब में कांग्रेस को  टीएमसी तथा आप ने कोई तवज्जो नहीं दी है। दोनों पार्टियों ने मनमानी तरीके से अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। केवल राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं ओडिसा में कांग्रेस अपने तरह से प्रतिद्वंद्विता कर रही है। केरल में इंडी गठबंधन के दो सहयोगी दल कांग्रेस तथा वाम गठबंधन चुनावी मैदान में आमने-सामने खड़ा है। कुल मिलाकर लोकसभा चुनाव में इंडी गठबंधन की मूल भावना को कार्यान्वित नहीं किया जा सका है। क्षेत्रीय दल भी अंतर्विरोध के दौर से गुजर रहे हैं। वे लोग गठबंधन में तो एक साथ हैं, किंतु भीतर ही भीतर उनके अंदर भी मतभेद है। वर्तमान चुनाव कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ है, क्योंकि अगर कांग्रेस का बेहतर प्रदर्शन नहीं हुआ तो उनके लिए आगे का रास्ता बहुत कठिन हो जाएगा।