इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की पाकिस्तान यात्रा का कूटनीतिक एवं सामरिक महत्व है। कुछ महीने पहले तक ईरान और पाकिस्तान के बीच एक-दूसरे पर किये गए हमले को लेकर तनाव बढ़ गया था। लेकिन इजरायल के साथ बने हालात ने फिर से दोनों देशों को नजदीक ला दिया है। पर्दे के पीछे से चीन की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ईरान और पाकिस्तान दोनों चीन के लिए महत्वपूर्ण है। सी-पैक परियोजना के लिए पाकिस्तान में शांति जरूरी है जिसमें ईरान की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। चीन सी-पैक में 60 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश कर चुका है। ईरान मुस्लिम देशों का खलीफा बनने के लिए प्रयासरत है। इजरायल पर सीधा हमला कर ईरान ने मुस्लिम देशों को यह दिखाने का प्रयास किया है कि उसमें काफी हिम्मत है। मालूम हो कि 13 अप्रैल को ईरान द्वारा इजरायल पर 300 से अधिक ड्रोनों एवं मिसाइलों से हमला किया गया था।

इसके जवाब में इजरायल ने भी ईरान के तीसरे बड़े एवं सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस्फहान शहर पर हमला किया। महलों एवं मीनारों के शहर इस्फहान में ईरान के परमाणु केंद्र है। साथ ही ड्रोन एवं बैलेस्टिक मिसाइल का निर्माण कार्य भी उसी शहर में होता है। इजरायल ने इस शहर को निशाना बनाकर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि ईरान का कोई भी इलाका उसकी जद से बाहर नहीं है। पाकिस्तान एकमात्र परमाणु संपन्न मुस्लिम राष्ट्र है। ईरान पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध बनाकर परमाणु हथियार बनाने की दिशा में सहयोग चाहता हो।

बदले में ईरान पाकिस्तान में निवेश करेगा। दोनों देशों के राष्ट्र प्रमुखों द्वारा आयोजित संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया। लेकिन ईरान के राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कश्मीर का बिल्कुल नाम नहीं लिया। इसी तरह पाकिस्तान ने भी सीधा इजरायल का नाम नहीं लिया। इजरायल पर कोई बड़ा हमला करने से पहले ईरान अपने आसपास के देशों को विश्वास में लेना चाहता है। दूसरी तरफ इजरायल किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए तैयार है। ईरान और पाकिस्तान के बीच 80 किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन का निर्माण कार्य अधर में लटका हुआ है।

ईरान ने अपने क्षेत्र में इसका काम पूरा कर लिया है, जबकि पाकिस्तान की तरफ से कोई खास प्रगति नहीं हुई है। कंगाली के दौर से गुजर रहा पाकिस्तान खुद दूसरे देशों से कर्जा मांग रहा है। पाइपलाइन का निर्माण कार्य पूरा करने के लिए काफी धन की जरुरत होगी। अमरीका नहीं चाहता है कि पाकिस्तान और ईरान के बीच पाइपलाइन का निर्माण कार्य पूरा हो। ईरानी राष्ट्रपति की पाकिस्तान यात्रा पर अमरीका तथा पश्चिमी देशों की नजर है। अगर दोनों देशों के बीच इजरायल के खिलाफ कोई बड़ा समझौता हुआ तो इसका खामियाजा पाकिस्तान को अमरीकी प्रतिबंध के रूप में भुगतना पड़ सकता है। अमरीका के इशारे पर दूसरे पश्चिमी देश भी पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। ईरान पहले से ही प्रतिबंधों की जाल में जकड़ा हुआ है। दुनिया की नजर अभी पाकिस्तान की ओर टिकी हुई है।