नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट से इलेक्टोरल बॉन्ड अवैध घोषित होने के बाद चुनावी फंडिंग के तौर-तरीकों को लेकर सरकार के भीतर मंथन शुरू हो गया है। सूत्रों की मानें तो सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड जैसी नई स्कीम लाने की योजना बनाई है। वित्त मंत्रालय में इसके इनोवेटिव मॉडल पर दो बैठकें हो चुकी हैं। इसमें चर्चा हुई कि वह कौन सा तरीका हो, जो संविधान के मानकों पर खरा उतरे और सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा की कसौटी की बाधा पार कर सके। इलेक्टोरल बॉन्ड के नए अवतार वाली स्कीम को कानूनी कसौटी पर खरा रखने के लिए विधि आयोग और कानूनी विशेषज्ञों की समिति बनाई जाएगी।
चुनाव आयोग से भी व्यापक परामर्श किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यदि कोई व्यक्ति 'ए' यह बॉन्ड बैंक से खरीदता है, तो उसका पूर्ण विवरण रिकॉर्ड में दर्ज हो जाता है। लेकिन यदि 'बी' यह इलेक्टोरल बॉन्ड सर्टिफिकेट 'ए' को कुछ अतिरिक्त नकद राशि देकर हासिल कर ले और किसी राजनीतिक पार्टी 'सी' को दे तो 'बी' का नाम कहीं से भी रिकॉर्ड में नहीं आता है। ऐसे अंदेशों के लिए भी नए इलेक्टोरल बॉन्ड में व्यवस्था करने की तैयारी है।
वित्त मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि चुनावी फंडिंग के इनोवेटिव मॉडल पर मंथन चल रहा है। पहले बोरों में भरकर नोट इधर से उधर होते थे। इसे कैसे जारी रख सकते हैं? सरकार के भीतर यह मंथन इस बात को देखते हुए अहम है कि पीएम मोदी ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि चुनावी बॉन्ड व्यवस्था में खामियां हो सकती हैं, लेकिन पैसे के आने-जाने के स्रोत का पता तो चल रहा था। 2014 से पहले पैसा तो खर्च हो रहा था, पर किसे पता होता था कि वह कहां से आया, किसके पास गया।
पीएम मोदी ने ये बातें तमिलनाडु के न्यूज चैनल थांथी टीवी को दिए एक घंटे के इंटरव्यू में कही थीं। प्रधानमंत्री से पूछा गया था कि क्या इलेक्टोरल बॉन्ड का डेटा पब्लिक होने से पार्टी को झटका लगा है? 31 मार्च को भाजपा ने यूट्यूब चैनल पर इस इंटरव्यू को जारी किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि मोदी ने इलेक्टोरल बॉन्ड की स्कीम बनाई तो पता चल पा रहा है कि कौन-सा पैसा किसने कब और किसको दिया। जो लोग डेटा पब्लिक होने को लेकर हल्ला मचा रहे हैं, उन्हें बाद में अफसोस होगा।