होलिका एक बार नहीं जली, वो तो वर्षों से जलती आ रही है। रावण की तरह लोग जलाकर खुश हो लेते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत मना लेते हैं। अपने अंदर की बुराई को हम खत्म करें तो बात बने। होलिका एक सिद्धि प्राप्त और तंत्र-मंत्र की ज्ञाता स्त्री थी। ब्रह्मा से उसने अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त कर लिया था। उसे एक वस्त्र भी प्राप्त था, जो उसे अग्नि से बचाव हेतु दिया गया था। कहते हैं ईश्वर की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती। वो वरदान भी देते हैं तो कोई न कोई कहानी इंतजार कर रही होती है।
ब्रह्मा जी ने यह भी कहा था पराये मर्द के सानिध्य में होलिका अग्नि में सुरक्षित नहीं रहेगी। यही बात उसके मृत्यु का कारण रही थी। एक छोटा बालक जो उसका भतीजा भी था को उसने पराया नहीं समझा और उसका अद्भुत वस्त्र भी कब भक्त प्रह्लाद पर गिरकर उसका सुरक्षा कवच बन गया था उसे अहसास ही नहीं हुआ था। भाई हिरण्यकश्यप के खतरनाक खेल में भक्त प्रह्लाद बच गया था और होलिका दहन हो गया था। होलिका दुल्हन बनने वाली थी और राजकुमार इलोजी की बारात विवाह के लिए निकल चुकी थी।
इलोजी को दुल्हन की जगह दुल्हन की राख मिली थी। उन्हें होलिका से विशेष प्रेम था, वे विलाप करते हुए धुल और राख को अपने तन में मलने लगे थे। कहते हैं धुलंडी इसलिए होलिका दहन के दूसरे दिन मनाई जाती है। कुंवारा वर इलोजी लोकदेवता के रूप में वर्तमान में भी राजस्थान में पूजे जातें हैं। उनकी पोशाक दूल्हे वाली ही होती है। होलिका दहन से एक पाठ यह भी मिलता है अनुचित कार्यों में भागीदार बनने से किसी का भला नहीं होता। भाई के मोह में और वरदान के अहंकार से होलिका दुल्हन की जगह राख बन गई थी। होलिका किसी का सच्चा प्यार थी, उसका सुंदर संसार बनने से पहले ही उजड़ गया था। उसे तो नन्हे भतीजे से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी। होलिका की राख अमर हो गई, लोगों और देवता इलोजी के तन-मन में !!!