लोकसभा चुनाव से पहले हरियाणा में सियासी हलचल बढ़ गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लोकसभा चुनाव में राज्य की सभी दस सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए आनन-फानन में मनोहरलाल खट्टर को मुख्यमंत्री पद से मुक्त कराकर नायब सिंह सैनी को कमान सौंप दी है। 12 मार्च को बदलते घटनाक्रम के तहत एक ही दिन में खट्टर की विदाई तथा सैनी की ताजपोशी हो गई। दूसरी बड़ी घटना यह हुई कि भाजपा की सहयोगी पार्टी जननायक जनता पार्टी (जजपा) के साथ गठबंधन भी टूट गया। इस पूरे घटनाक्रम को लोकसभा चुनाव की दृष्टि से देखा जा रहा है। जजपा भाजपा से हरियाणा की दस लोकसभा सीटों में से तीन सीटों रोहतक, हिसार एवं सोनीपत देने की मांग कर रही थी। जजपा का मानना था कि अगर इनमें से दो सीट मिल जाए तो वह राजी हो सकती है। भाजपा हरियाणा की सभी 10 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ महीने पहले ही हरियाणा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए लोगों से भाजपा की सभी सीटों पर कमल खिलाने का आह्वान किया था। इसका अर्थ स्पष्ट है कि भाजपा पहले से ही हरियाणा की सभी लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना चुकी थी। हिसार संसदीय क्षेत्र से भाजाप कांग्रेस से आए कुलदीप बिश्नोई को चुनाव लड़वाना चाहती है। भाजपा जजपा को कुरुक्षेत्र देने का ऑफर कर रही थी, किंतु बात नहीं बनी। अब भाजपा ने नया पैंतरा अपनाते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को हटाकर जातीय समीकरण साधने का प्रयास किया है। सैनी अति पिछड़े वर्ग से आते हैं जिसका लाभ भाजपा को मिलेगा। हरियाणा में 25 प्रतिशत जाट वोटर हैं। भाजपा जाट वोटरों में विभाजन करवाकर बाकी के 70 प्रतिशत वोटों को अपनी ओर खींचना चाहती है। हरियाणा के पिछड़े, अनुसूचित जाति के गैर-जाट वोटरों को आकर्षित करने के लिए भाजपा अपनी नीति पर काम कर रही है। पंजाबी समुदाय, वैश्य समुदाय एवं ठाकुर समुदाय में भी भाजपा का अच्छा प्रभाव है। अगर भाजपा और जजपा का गठबंधन बरकरार रहता तो हरियाणा के जाट वोटरों में बंटवारा नहीं होता तथा इसका सीधा लाभ कांग्रेस को मिलता। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का जाट वोटरों पर अच्छा प्रभाव है। हरियाणा में पंजाबी समुदाय के लोगों की जनसंख्या 8 प्रतिशत, ब्राह्मण की 7.5 प्रतिशत, मुसलमानों की 3.5 प्रतिशत, गुर्जरों की 3 प्रतिशत, वैश्यों का 5 प्रतिशत तथा यादव समुदाय का 5 प्रतिशत है। मनोहर लाल खट्टर को हटाकर भाजपा ने हरियाणा में सरकार विरोधी भावना को खत्म करने का प्रयास किया है। पिछले कुछ महीनों से खट्टर सरकार के खिलाफ राज्य में नाराजगी बढ़ रही थी। दूसरी बात यह है कि पंजाबी समुदाय एवं सामान्य वर्ग से होने के कारण भी भाजपा को हरियाणा में जातीय संतुलन को बनाने में कठिनाई हो रही थी। भाजपा ने जजपा से गठबंधन तोड़ने से पहले अपना होमवर्क पूरा कर लिया था। मालूम हो कि 9 दिसंबर 2018 में इंडियन नेशनल लोकदल (इनैलो) से अलग होकर दुष्यंत चौटाला ने जजपा का गठन किया था। वर्ष 2019 में हुए हरियाणा विधानसभा के चुनाव में भाजपा को केवल 40 सीटें मिलीं जो बहुमत से छह सीटें कम थी, जबकि जजपा की 10 सीटें मिली थी। बाध्य होकर भाजपा को जजपा के साथ समझौता कर सरकार बनानी पड़ी। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा ने सात निर्दलीय एवं हरियाणा लोकहित पार्टी के विधायकों को लेकर सैनी के नेतृत्व में नई सरकार का गठन कर लिया। भाजपा सैनी को लाकर राज्य के पिछड़े वर्गों को साधना चाहती है। आरएसएस के कैडर रहे सैनी खट्टर के भी विश्वास पात्र माने जाते हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ की ही तरह हरियाणा में भी एक राजनीतिक दांव खेला है जिसका लाभ भाजपा को अगले लोकसभा चुनाव में निश्चित रूप से मिलेगा। भाजपा के इस पहल से विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी हैरान है, क्योंकि पार्टी की रणनीति बिगड़ रही है। भाजपा के मिशन 370 एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के मिशन 400 को पूरा करने के लिए हरियाणा की सभी सीटों पर भाजपा का जीतना जरूरी है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां सभी 10 सीटों पर विजय दर्ज की थी। एक तरफ भाजपा जातीय समीकरण को साधने में लगी है तो दूसरी तरफ हरियाणा के लिए प्रधानमंत्री ने लाभार्थी योजना का पिटारा भी खोल दिया है। अब सब कुछ जनता की अदालत में है।
हरियाणा में सियासी हलचल
