सुप्रीम कोर्ट ने पिछले चार मार्च को रिश्वतखोर सांसद-विधायकों के खिलाफ ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अपने ही 25 वर्ष पहले के फैसले को पलट दिया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद रिश्वत लेकर पाला बदलने वाले या संसद या विधानसभा में स्पीच देने वाले सांसद या विधायक अब बच नहीं पाएंगे। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चन्द्रचूड़ की अगुवाई वाली सात सदस्यीय पीठ ने कहा है कि सदन के सदस्यों के भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से भारतीय संसदीय लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है। पीठ ने यह भी कहा है कि रिश्वत लेने के मामले में जन प्रतिनिधियों को संसदीय विशेषाधिकारों के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के पांच सांसदों द्वारा 1993 में रिश्वत लेकर लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहंुचा था। वर्ष 1998 में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-105 और 194 के तहत संसद एवं विधानसभाओं के प्रतिनिधियों के रिश्वत के मामले को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। यह उनके विशेषाधिकार का मामला है। झारखंड मुक्ति मोर्चा की विधायक सीता सोरेन पर वर्ष 2012 में राज्यसभा में एक प्रत्याशी के लिए रिश्वत लेकर वोट देने का आरोप लगा था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। न्यायालय ने अपने पुराने फैसले को ही पलटते हुए कहा है कि घूसखोर सांसदों और विधायकों के संसदीय विशेषाधिकार के तहत कोई छूट नहीं मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न्यायालय के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे देश में साफ-सुथरी राजनीति को बढ़ावा मिलेगी तथा लोकतंत्र की जड़ मजबूत होगी। मुख्य न्यायाधीश चन्द्रचूड़ ने ये कहा कि सांसदों एवं विधायकों द्वारा रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी नष्ट करते हैं। यह संविधान की आकांक्षाओं और विचारशील आदर्शों के लिए विनाशकारी हंै। मालूम हो कि देश में लोकतंत्र के नाम पर सांसदों एवं विधायकों की खरीदारी कर सरकार बनाने एवं गिराने का काम देश में कई वर्षों से चल रहा है। विशेषाधिकार के नाम पर न्यायिक व्यवस्था के अधीन नहीं आने के कारण जन प्रतिनिधि बेखौफ होकर अपनी दुकानदारी चला रहे थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस तरह की धांधली पर निश्चित रूप से रोक लगेगी। इधर कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसले भारतीय लोकतंत्र के पक्ष में गए हैं। कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में पुरानी इलेक्ट्रो बांड स्कीम को अवैध घोषित करते हुए इसके माध्यम से चंदा लेने पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा था कि इलेक्ट्रो बांड चंदा लेना असंवैधानिक है तथा वह सूचना के अधिकार कानून का उल्लंघन है। देश के मतदाताओं को चुनावी बांड के बारे में जानकारी होनी चाहिए, क्योंकि उनको वोट देने से पहले पार्टी और उम्मीदवारों के बारे में जानने का पूरा हक है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में भी ऐतिहासिक फैसला देते हुए भाजपा के चेयरमैन मनोज कुमार सोनकर को हटाकर आप के नेता कुलदीप कुमार को चंडीगढ़ का मेयर बना दिया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि चंडीगढ़ चुनाव अधिकारी अनिल मसीह ने पक्षपात करते हुए कई पार्षदों का वोट अवैध कर दिया था। कोर्ट के इस फैसले से देश में लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास निश्चित रूप से बढ़ा है। लोकतंत्र के नाम पर सांसदों और विधायकों की मनमानी नहीं चल सकती। देश के राजनीतिक दलों को भी चुनाव में स्वच्छ छवि वाले नेताओं को तरजीह देनी चाहिए। लोकतंत्र को मजबूत करने की जिम्मेवारी केवल न्यायालय की ही नहीं है बल्कि राजनीतिक दलों को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। देश की जनता को भी लोकतंत्र का सजग प्रहरी बनकर आगे आना होगा।