लोकसभा चुनाव को लेकर गहमागहमी के बीच राज्यसभा चुनाव में भी दांवपेंच का खेल चला। इस वर्ष राज्यसभा के 68 सदस्य सेवानिवृत्त होंगे जिनमें 9 केंद्रीय मंत्री भी शामिल हैं। इसमें से 56 सदस्य अप्रैल तक राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे हैं। 41 उम्मीदवार पहले ही निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं। बाकी के 15 सीटों के लिए 27 फरवरी को मतदान हुआ है। सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से 10 सीटों के लिए, कर्नाटक से चार सीटों के लिए तथा हिमाचल से एक सीट के लिए चुनाव हुआ है। सबसे बड़ा खेला उत्तर प्रदेश में हुआ है। यहां विधानसभा सदस्यों की संख्या के अनुसार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सात सीटों पर तथा समाजवादी पार्टी (सपा) तीन सीटों पर जीत सकती थी। समाजवादी पार्टी को अपने तीसरे उम्मीदवार की जीत के लिए प्राथमिक एक वोट की जरुरत थी, वहीं भाजपा को अपने आठवें उम्मीदवार की जीत के लिए सात वोटों की जरुरत थी। समाजवादी पार्टी के सात विधायकों ने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया जबकि समाजवादी पार्टी का एक सदस्य अनुपस्थित रहा। कल से ही समाजवादी पार्टी में विधायकों के पाला बदलने को लेकर हंगामे की स्थिति रही। अंतिम समय तक समाजवादी पार्टी ने विधायकों को अपने पास रखने का भरसक प्रयास किया, किंतु वे सफल नहीं हो सके। इसका परिणाम यह हुआ है कि भाजपा ने आठवें सीट पर जीत दर्ज कर सपा को करारा झटका दिया है। कर्नाटक में चार सीटों के लिए चुनाव हुए थे जिसमें कांग्रेस को तीन तथा भाजपा को एक सीट पर विजय मिली है। हिमाचल की एकमात्र सीट पर भाजपा ने विजय हासिल कर बड़ा उलट-फेर किया है। हिमाचल में कांग्रेस के पास ज्यादा विधायक होने के बावजूद भाजपा ने बाजी मार ली है। दोनों दलों के प्रत्याशियों को 34-34 वोट मिले थे। इसके बाद पर्ची से फैसला हुआ, जो भाजपा के पक्ष में गया। इससे पहले 12 राज्यों के 41 उम्मीदवार निर्वाचित हो चुके हैं। इसमें कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी राजस्थान से तथा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा गुजरात से निर्विरोध चुने गए हैं। राज्यसभा के चुनाव में कई केंद्रीय मंत्रियों का पत्ता कट गया है। दूसरी तरफ कांग्रेस से भाजपा में आये महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया गया था। इसी तरह कई दल-बदलू नेता विभिन्न पार्टियों के टिकट पर निर्विरोध चुनाव जीत चुके हैं। राज्यसभा चुनाव में जातीय समीकरण का पूरा ख्याल रखा गया है। यही कारण है कि कई केंद्रीय मंत्रियों की जगह नए चेहरों को तरजीह दी गई है। मालूम हो कि राज्यसभा में कुल सदस्यों की संख्या 245 है जिसमें 233 सदस्यों का निर्वाचन होता है तथा बाकी के 12 सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं। इस वर्ष सबसे अधिक उत्तर प्रदेश से दस सीटें, महाराष्ट्र एवं बिहार से छह-छह, मध्यप्रदेश तथा पश्चिम बंगाल से पांच-पांच, कर्नाटक और गुजरात से चार-चार, ओडिसा, तेलंगाना, केरल और आंध्रप्रदेश से तीन-तीन, झारखंड और राजस्थान से दो-दो तथा उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और छत्तीसगढ़ से एक-एक सीट खाली हुई थी। चार मनोनीत सदस्य जुलाई में सेवानिवृत्त होंगे। देश में जातीय समीकरण की जो राजनीति चल रही है उसका असर राज्यसभा चुनाव में पड़ना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के दौरान जिस तरह शह और मात का खेल चला उसका असर लोकसभा चुनाव पर भी निश्चित रूप से पड़ेगा। लोकसभा चुनाव नजदीक होने के कारण विभिन्न पार्टियों के नेता अपनी राजनीति को ध्यान में रखकर पाला बदल रहे हैं। जिन नेताओं को उनकी पार्टियों से टिकट मिलने की उम्मीद नहीं है वे दूसरी पार्टियों की ओर रुख कर रहे हैं। अब राजनीति में सिद्धांत नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। सब कुछ स्वार्थ की तराजू से तौला जा रहा है।