भले ही इजरायल-फिलस्तीन युद्ध पर शेष विश्व खामोश है। दो खेमें में बंटी दुनिया को इस बात की चिंता नहीं कि फिलस्तीन में निर्दोष लोगों की मौत हो रही है और मरने वाले हमास के टेरर में शामिल नहीं हैं, फिर भी हमास के गुनाहों की सजा आम फिलस्तिनियों को मिल रही है। इजरायल सरकार गाजा में जो भी कर रही है, उसे मानवता में विश्वास करने वाले कतई स्वीकार नहीं करेंगे, फिर भी इजरायल के अन्याय का यूएसए, यूके, फ्रांस और कई यूरोपीय देश प्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर रहे हैं, परंतु लाल सागर में हुती विद्रोहियों की सक्रियता भारत सहित पूरी दुनिया के आर्थिक तंत्र को प्रभावित कर रही है। उल्लेखनीय है कि इन दिनों लाल सागर में यमन के हूतियों की ओर से मिसाइल और ड्रोन हमले बढ़ गए हैं। हूती कहते हैं कि वो गाजा युद्ध में फिलस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखा रहे हैं, लेकिन उनके हमलों की वजह से कई मालवाहक कंपनियों को अपने जहाजों का रास्ता बदल कर उन्हें स्वेज नहर से दूर अफ्रीका के दक्षिणी छोर पर केप ऑफ गुड होप से होकर भेजना पड़ा है। इस संकट की वजह से वैश्विक सप्लाई चेनें उलट पुलट हो गई हैं। यहां तक कि चीनी निर्यातकों को भी बहुत नुकसान हो रहा है। कई सप्लायरों ने दाम, बीमा और माल ढुलाई आधार पर निर्यात संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं जिसकी वजह से ढुलाई और बीमा के खर्च में जो बढ़ोत्तरी हुई है, तो उसके लिए वो ही जिम्मेदार होंगे। दूसरी ओर भारत में छोटे निर्यातकों ने चेतावनी दी है कि नौकरियों का जाना शुरू हो गया है और अगर हूतियों के हमले नहीं रुके तो और नौकरियां जा सकती हैं। भारत साल में 3,735 अरब रुपए मूल्य के उत्पादों का निर्यात करता है और इसमें से 40 प्रतिशत हिस्सा छोटे निर्यातकों का ही है। उद्योग से जुड़े लोगों के अनुमान के मुताबिक ये छोटे निर्यातक इस संकट के पहले से बहुत ही कम मुनाफे पर काम कर रहे थे, जो अमूमन तीन से सात प्रतिशत के बीच था। जानकार बताते हैं कि लाल सागर के मुद्दे की वजह से भारत के टेक्सटाइल हब तिरुपुर में अभी से नौकरियां जानी शुरू हो चुकी हैं वहां छोटे निर्यातक अपनी क्षमता के एक-तिहाई स्तर पर काम कर रहे हैं। ज्यादा समय लगने की वजह से माल ढोने की क्षमत भी कम हो गई है और कंटेनरों की कमी भी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है क्योंकि बड़े निर्यातकों ने बल्क में सभी कंटेनर बुक कर लिए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को छोटे निर्यातकों की मदद करनी चाहिए नहीं तो उनमें से कइयों का धंधा बंद ही हो जाएगा। निर्यात संगठनों ने आधिकारिक तौर पर सरकार से राहत मांगी है। सरकार ने व्यापार मंत्रालय में एक समिति बनाई है जो स्थिति पर नजर रखेगी और मदद के निवेदनों पर विचार करेगी। यूरोप और अमरीका के साथ भारत के मर्चेंडाइज व्यापार का 80 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा सामान्य रूप से लाल सागर से होकर गुजरता है। भारत एक महीने में लगभग 664 अरब रुपए मूल्य के मर्चेंडाइज यूरोप भेजता है और करीब 498 अरब मूल्य अमरीका भेजता है। टेक्सटाइल्स और इंजीनियरिंग का सामान उन इलाकों में जाने वाले भारत का सबसे बड़ा निर्यात है। केप ऑफ गुड होप से घूम कर जाने का मतलब है भारत से जाने वाले जहाजों को अक्सर यूरोप में अपने ठिकानों पर पहुंचने से पहले अतिरिक्त 15-20 दिन चाहिए। इससे खर्च बहुत बढ़ जाता है। कंटेनर ब्रिटेन भेजने की लागत जहां लाल सागर का संकट शुरू होने से पहले करीब 50,000 रुपए थी,वहीं अब वह बढ़कर तीन लाख रुपयों से भी ज्यादा हो गई है। इंदौर की कपड़े बनाने की कंपनी प्रतिभा सिंटेक्स का कहना है कि यह कई कपड़ा निर्यातकों के लिए सबसे खराब समय में से एक है। अगर यह स्थिति जारी रही तो कम से कम हर पांचवें छोटे निर्यातक को लोगों को नौकरी से निकालना पड़ेगा। कपड़ा उद्योग सीधे 4.5 करोड़ लोगों और दूसरे तरीकों से अतिरिक्त 1.5 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। कुल मिलाकर स्थिति भयावह और लाखों को बेरोजगार करने वाली है, फिर भी पूरी दुनिया फिलस्तिनियों पर हो रहे अत्याचार का विरोध नहीं कर रहे हैं, जिनसे उनका भी हित जुड़ा हुआ है।
युद्ध से नुकसान
