नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को एक ऐतिहासिक फैसले में राजनीति के वित्तपोषण के लिए लाई गई चुनावी बॉण्ड योजना को ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए निरस्त कर दिया तथा चंदा देने वालों, बॉण्ड के मूल्यों और उनके प्राप्तकर्ताओं की जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने 2018 की इस योजना को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं सूचना के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। शीर्ष अदालत केंद्र की इस दलील से सहमत नहीं थी कि इस योजना का उद्देश्य राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता लाना और काले धन पर अंकुश लगाना था। लोकसभा चुनाव से पहले आए इस फैसले में उच्चतम न्यायालय ने इस योजना को तत्काल बंद करने तथा इस योजना के लिए अधिकृत वित्तीय संस्थान ‘भारतीय स्टेट बैंक’ (एसबीआई) को 12 अप्रैल, 2019 से अब तक खरीदे गये चुनावी बॉण्ड का विस्तृत ब्योरा छह मार्च तक निर्वाचन आयोग को सौंपने का भी निर्देश दिया। न्यायालय के आदेशानुसार, निर्वाचन आयोग 13 मार्च तक अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर छह वर्ष पुरानी योजना में दान देने वालों के नामों की जानकारी निर्वाचन आयोग को देने के निर्देश दिए। संविधान पीठ ने 232 पृष्ठों के अपने दो अलग-अलग, लेकिन सर्वसम्मत फैसलों में कहा कि एसबीआई को राजनीतिक दलों द्वारा भुगतान कराए गए सभी चुनावी बॉण्ड का ब्योरा देना होगा। इस ब्योरे में यह भी शामिल होना चाहिए कि किस तारीख को यह बॉण्ड भुनाया गया और इसकी राशि कितनी थी। इसने कहा कि साथ ही पूरा विवरण छह मार्च तक निर्वाचन आयोग के समक्ष पेश किया जाना चाहिए। पीठ में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे। शीर्ष अदालत ने एसबीआई को विवरण साझा करने का भी निर्देश दिया, जिसमें प्रत्येक चुनावी बॉण्ड की खरीद की तारीख, बॉण्ड के खरीदार का नाम और खरीदे गए चुनावी बॉण्ड का मूल्य शामिल है। प्रधान न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत बोलने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। उन्होंने फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनावी बॉण्ड योजना और विवादित प्रावधान ऐसे हैं कि वे चुनावी बॉण्ड के माध्यम से योगदान को गुमनाम बनाते हैं तथा मतदाता के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करते हैं, साथ ही अनुच्छेद 19(1)(ए) का भी उल्लंघन करते हैं। पीठ ने कहा कि नागरिकों की निजता के मौलिक अधिकार में राजनीतिक गोपनीयता, संबद्धता का अधिकार भी शामिल है। फैसले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और आयकर कानूनों सहित विभिन्न कानूनों में किए गए संशोधनों को भी अवैध ठहराया गया। शीर्ष अदालत ने 12 अप्रैल, 2019 को एक अंतरिम आदेश जारी किया था, जिसमें निर्देश दिया गया था कि राजनीतिक दलों को प्राप्त चंदे और आगे प्राप्त होने वाले चंदे की जानकारी एक सीलबंद कवर में निर्वाचन आयोग को प्रस्तुत करनी होगी। अदालत ने आदेश दिया कि 15 दिनों की वैधता अवधि वाले चुनावी बॉण्ड राजनीतिक दल या खरीदार द्वारा जारीकर्ता बैंक को वापस कर दिए जाएंगे, जो बदले में खरीदार के खाते में राशि वापस कर देगा। इसमें कहा गया कि एसबीआई चुनावी बॉण्ड जारी नहीं करेगा और 12 अप्रैल 2019 से अब तक खरीदे गए चुनावी बॉण्ड के ब्योरे निर्वाचन आयोग को देगा। न्यायालय ने कहा कि साथ ही एसबीआई को उन राजनीतिक दलों के भी ब्योरे देने होंगे, जिन्हें 12 अप्रैल 2019 से अब तक चुनावी बॉण्ड के जरिये धनराशि मिली है। फैसले में 2017-18 से 2022-23 तक राजनीतिक दलों की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट का हवाला दिया गया, जिसमें ऐसे बॉण्ड के माध्यम से प्राप्त पार्टी-वार चंदे को दर्शाया गया है। इस दौरान भाजपा को 6,566.11 करोड़ रुपये, जबकि कांग्रेस को 1,123.3 करोड़ रुपये मिले। इसी अवधि के दौरान तृणमूल कांग्रेस को 1,092.98 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। सीजेआई ने खुद और न्यायमूर्ति गवई, न्यायमूर्ति पारदीवाला और न्यायमूर्ति मिश्रा की ओर से 152 पन्नों का फैसला लिखा। इस फैसले में कहा गया है कि कंपनी अधिनियम के एक प्रावधान को हटाना और राजनीतिक दलों को असीमित कॉर्पोरेट चंदे की अनुमति देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) ‘एकतरफा और उल्लंघन’ था। यह मानते हुए कि किसी मतदाता को प्रभावी ढंग से वोट देने की अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने के लिए एक राजनीतिक दल को मिलने वाले वित्तपोषण के बारे में जानकारी आवश्यक है, पीठ ने कहा कि यह योजना न्यूनतम प्रतिबंधात्मक साधन परीक्षण को पूरा नहीं करती है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि चुनावी बॉण्ड योजना चुनाव में काले धन पर अंकुश लगाने का एकमात्र साधन नहीं है। ऐसे अन्य विकल्प भी हैं जो उद्देश्य को काफी हद तक पूरा करते हैं और सूचना के अधिकार पर चुनावी बॉण्ड के प्रभाव की तुलना में सूचना के अधिकार को न्यूनतम रूप से प्रभावित करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉण्ड योजना को किया निरस्त