फिलहाल भारत की विदेश नीति की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। पूरी दुनिया को लग रहा कि भारत अपनी करनी और कथनी दोनों से अपने सहयोगी देशों का दिल जीतने में कामयाब हुआ है और धीरे- धीरे इसकी छवि विश्वमित्र की बनती जा रही है, यह हमारे लिए अच्छी बात है और यह हमारी विदेश नीति की सफलता का परिचायक है। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मौकों पर भारत का जिक्र विश्वमित्र के रूप में किया है। इस शब्द का इस्तेमाल उन्होंने हाल के अपने भाषणों और देश भर में होने वाली रैलियों में जमकर किया है। पिछले साल सितंबर में उन्होंने संसद में कहा कि यह हम सभी के लिए गर्व की बात है कि भारत ने विश्वमित्र के रूप में अपनी जगह बनाई है और पूरी दुनिया भारत में एक मित्र को देख रही है। इस विचार का मकसद भारत को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करना है, जो चीन से अलग,अमरीका से अलग और यूरोपीय लोगों से अलग हो। इस अवधारणा में दोस्ती, सहयोग, सह-अस्तित्व और पारस्परिक लाभ शामिल है। साल 2023 में भारत ने नई दिल्ली में जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करके अपने सांस्कृृतिक और राजनयिक संबंधों का प्रदर्शन किया। हालांकि, तब से भारत सरकार का कई राजनयिक विवादों से भी सामना हुआ है। जी-20 सम्मेलन के अभी दो हफ्ते भी नहीं बीते थे कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ने भारत पर कनाडाई धरती पर सिख कार्यकर्ता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया। दिसंबर, 2023 में अमरीकी अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने अमरीकी धरती पर एक अमरीकी नागरिक की एक भारतीय व्यक्ति की ओर से की गई हत्या की साजिश को नाकाम कर दिया है। इस अमरीकी नागरिक ने भी एक सिख अलगाववादी राज्य की वकालत की थी। दोनों मामलों की जांच चल रही है। पड़ोसी देश म्यामां में साल 2021 में जब सैन्य तख्तापलट हुआ और उसके बाद से वहां आंतरिक संघर्ष बढ़ने लगा तो उससे लगी सीमा पर भारत ने फरवरी, 2021 में बाड़ लगाने की योजना की घोषणा की। जानकार बताते हैं कि अतीत में भी भारत का दोस्त बनने का इरादा था लेकिन तब उसमें कोई वास्तविक क्षमता नहीं थी क्योंकि हम घरेलू मुद्दों से निपट रहे थे। आज भारत की विश्वसनीयता काफी बढ़ी है। ऐसे में यह संभव नहीं है कि कोई भी बड़ा खिलाड़ी भारत को नजरअंदाज कर सके। एक समय ऐसा लग रहा था कि यूक्रेन- रूस युद्ध पश्चिम के साथ भारत के संबंधों को खत्म कर देगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पश्चिमी शक्तियों, खासकर अमरीका की भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी है क्योंकि उनके लिए चीन दीर्घकालिक समस्या है। इसके बजाए भारत ने रियायती कीमतों पर रूसी तेल स्वीकार कर लिया है जिससे रूस से होने वाले आयात में वृद्धि हुई है। इसके बावजूद भारत के रिश्ते अमरीका के साथ पहले से भी ज्यादा मजबूत हैं। अक्तूबर में वाशिंगटन डीसी की यात्रा पर पहुंचे विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने घोषणा की कि भारत और संयुक्त राज्य अमरीका के बीच इस समय संबंध ‘सबसे बेहतर हैं। उल्लेखनीय है कि भारत-अमरीका साझेदारी रक्षा, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा क्षेत्रों में संबंधों को गहरा करने के लिए है। यह चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ भारत की एक लंबे समय से चली आ रही अमरीकी धारणा को रेखांकित करता है। भारत एकमात्र ऐसी प्रमुख अर्थव्यवस्था है जिसके एक ही समय में ईरान, इजरायल, रूस और यूरोपीय संघ के साथ गहरे और अच्छे संबंध हैं। पिछले महीने ही विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ईरान और रूस दोनों देशों का दौरा किया था जबकि पीएम मोदी ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों को भारत में आमंत्रित किया था। इस अर्थ में तो भारत स्पष्ट रूप से विश्वमित्र है,लेकिन अब युद्ध का समय नहीं है जैसे बयानों के अलावा यह व्यावहारिक रूप से क्या संदेश देता है? साल 2014 में सत्ता में आने के बाद पीएम मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह के लिए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) देशों के नेताओं को निमंत्रण देकर भारत की पड़ोसी प्रथम नीति को पुनर्जीवित करने का संकेत दिया था। मोदी ने नेपाल में अपने पहले सार्क शिखर सम्मेलन में दिए भाषण में कहा कि मैं भारत के लिए जिस भविष्य का सपना देखता हूं, वही भविष्य मैं अपने पूरे क्षेत्र के लिए चाहता हूं। जानकार बताते हैं कि ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में भारत जिस तरह से आगे बढ़ रहा है, उससे लोगों में ऐसी भावना है कि भारत इस क्षेत्र और इसके पड़ोस को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
विश्वमित्र की भूमिका
