सरकार कालाजर को जड़-मूल से समाप्त करने के लिए लगातार प्रयासरत है, उसे इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। भारत ने इस बीमारी पर नियंत्रण पाने में तेजी दिखाई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल सिर्फ 520 मामले रह गए थे। भारत कालाजर खत्म करने के करीब पहुंच चुका है। यह उपलब्धि भविष्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों की प्रतिबद्धता को मजबूत बनाएगी और दूसरी वेक्टर जनित बीमारियों से लडऩे के लिए और ज्यादा समर्थन, सहायता और संसाधन आकर्षित करेगी। कालाजर को ब्लैक फीवर भी कहा जाता है। ये वेक्टर जनित बीमारी लीश्मनायसिस का एक गंभीर रूप है और प्रोटोजोआ परजीवियों से होती है। संक्रमित मादा सैंडफ्लाई के काटने से यह बीमारी मनुष्यों में फैलती है। मलेरिया के बाद कालाजर परवीजी से होने वाली दूसरी सबसे जानलेवा बीमारी है। 76 देशों में 20 करोड़ लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं।
कालाजर से पीडि़त मरीज में एनीमिया, बुखार, वजन कम होना, जिगर और तिल्ली का आकार बढऩा जैसे लक्षण दिखने लगते हैं। इसका उपचार उपलब्ध है, लेकिन समय पर इलाज न मिला तो कालाजर से जान भी जा सकती है। दक्षिण एशिया में भारत, बांग्लादेश और नेपाल इस बीमारी के गढ़ माने जाते थे। भारत में कालाजर के मामले मुख्यत: चार राज्यों में मिलते हैं- बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल। भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश ने अपने यहां 2023 में कालाजर बीमारी के उन्मूलन की घोषणा कर दी थी। कालाजर के प्रसार का एक मुख्य कारण है- बीमारी की पहचान में देरी। एक हल्की, धीमी गति के साथ बीमारी फैलती जाती है। मरीज अक्सर सामान्य बुखार कहकर इसकी अनदेखी करते हैं और इलाज नहीं करवाते हैं। कई बार इलाज के बिना एक महीना या उससे ज्यादा समय भी बीत जाता है।
आमतौर पर माना जाता है कि कालाजर अगर किसी एक व्यक्ति को भी हुआ, तो गांव के और लोग भी बीमारी की चपेट में आ जाएंगे। ग्रामीण इलाकों में मिट्टी के घरों में रहने वाले लोगों पर भी कालाजर का ज्यादा असर देखा गया है। पहले इस बीमारी की सारी दवाएं विषैली थीं, मगर अब वैसी बात नहीं है। बीमारी के बने रहने की दूसरी वजह यह थी कि देश के सबसे गरीब लोगों पर ही इसकी सबसे ज्यादा मार पड़ी। उपचार उपलब्ध था, फिर भी जानकारी की कमी के कारण संक्रमित लोग नहीं जानते थे कि जाएं तो जाएं कहां? इसके अलावा बीमारी की वेक्टर इन मक्खियों से निजात पाना भी मुश्किल है। मरीजों की गरीबी भी बीमारी के खात्मे में देरी का एक बड़ा कारण रही है। दूसरी ओर इन बीमारियों का सुरक्षित और असरदार इलाज खोजने की प्रक्रिया धीमी रही है। आंकड़ों के मुताबिक 76 देशों में लगभग 20 करोड़ लोग कालाजर से प्रभावित हैं। मलेरिया के बाद कालाजर, परवीजी से होने वाली दूसरी सबसे जानलेवा बीमारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों के मुताबिक कालाजर के उन्मूलन की स्थिति को बनाए रखने के लिए भारत में 10 हजार लोगों की आबादी में एक से भी कम मामला होना चाहिए।
स्वास्थ्य अधिकारियों को अगले तीन साल ऐसी स्थिति बनाए रखनी होगी। इससे पहले भारत 2010, 2015, 2017 और 2023 में कालाजार उन्मूलन की डेडलाइन पूरी नहीं कर पाया था। जानकार कहते हैं कि भारत को अब पोस्ट कालाजर डर्मल लीश्मनायसिस (पीकेडीएल) पर ध्यान देना चाहिए। इस बीमारी में कालाजर से ठीक होने वाले कुछ मरीजों की त्वचा पर चकत्ते उभर आते हैं और फिर वही लोग संक्रमण के वाहक भी बन जाते हैं। फिलहाल इस बीमारी के लिए बहुत असरदार और सुरक्षित दवाएं नहीं हैं। उपचार की प्रक्रिया लंबी है और अनुपालन भी कम है। पिछले 10 साल में कालाजार के मामलों में भले ही कमी आई है, लेकिन पीकेडीएल के मामलों की संख्या उस गति से नहीं गिरी है। पीकेडीएल मामलों की संख्या कम तो हुई है, लेकिन वे अभी भी हैं क्योंकि फिलहाल उसका अच्छा इलाज उपलब्ध नहीं है। जब तक पीकेडीएल मामलों का उपचार नहीं हो जाता, कालाजर के फिर से उभर आने का खतरा हमेशा बना रहेगा। उससे जुड़ी सामाजिक शर्म और संकोच के चलते मरीज सामने आने से हिचकते हैं और इलाज से बचते हैं, यह ठीक नहीं है।