आखिरकार आज रविवार को वहीं हुआ, जिसका मीडिया में कयास पिछले एक पखवाड़े से लगाया जा रहा था और इसकी संभावना पिछले एक-डेढ़ महीने से व्यक्त की जा रही थी यानी जदयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। उन्होंने ऐसा करके स्पष्ट कर दिया कि फिलवक्त देश में राजनीतिक अवसरवाद की धूम है और राजनीतिक नैतिकता के लिए अब कोई जगह शेष नहीं है। उल्लेखनीय है कि राजभवन में राज्यपाल राजेन्द्र आर्लेकर ने नीतीश कुमार को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। कुमार के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं विजय कुमार सिन्हा, सम्राट चौधरी और प्रेम कुमार ने भी मंत्रिपद की शपथ ली। जद(यू) नेता विजय कुमार चौधरी, विजेंद्र यादव और श्रवण कुमार के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की अगुवाई वाले हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के संतोष कुमार सुमन और निर्दलीय विधायक सुमित सिंह ने भी मंत्री पद की शपथ ली। सनद रहे कि नीतीश ने दिन में यह कहते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया कि बिहार में सत्तारूढ़ महागठबंधन और विपक्षी इंडिया गठबंधन में उनके लिए चीजें ठीक नहीं चल रही हैं। इसी के साथ उन्होंने भाजपा के सहयोग से नई सरकार बनाने का दावा भी पेश किया। लगभग डेढ़ साल पहले उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ लिया था। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता भी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए। नीतीश के पूर्व सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार किया, जबकि एक अन्य पूर्व सहयोगी कांग्रेस भी अनुपस्थित रही। जद(यू) सुप्रीमो ने 2000 में राज्य के मुख्यमंत्री पद की पहली बार शपथ ली थी, लेकिन उनकी सरकार एक सप्ताह के भीतर ही गिर गई थी। उन्होंने मई 2014 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन आठ महीने बाद ही जीतन राम मांझी को हटाकर उन्होंने नवंबर 2015 में मुख्यमंत्री के रूप में वापसी की। उस समय जद(यू), राजद और कांग्रेस गठबंधन ने विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की थी। उन्होंने 2017 में भाजपा के साथ नई सरकार बनाने के लिए इस्तीफा दे दिया था। वह 2020 के विधानसभा चुनाव में फिर मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने जीत हासिल की थी, जबकि जदयू ने खराब प्रदर्शन किया था। नीतीश के इस्तीफे के बाद जदयू नेता केसी त्यागी ने इंडिया गठबंधन के नेतृत्व को लेकर चल रहे विवाद और उससे नाराजगी की तरफ इशारा किया। उन्होंने कहा कि दरअसल कांग्रेस का एक भाग इंडिया गठबंधन के नेतृत्व को हड़पना चाहता है। 19 दिसंबर को गठबंधन की जो बैठक हुई थी उसमें एक साजिश के तहत गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए मल्लिकार्जुन खडग़े का नाम सुझाया गया। इससे पहले मुंबई में हुई बैठक में सर्वसम्मति से ये तय हुआ था कि किसी के चेहरे को आगे किए बगैर गठबंधन काम करेगा। पहली शाम को केजरीवाल के आवास पर गई ममता बनर्जी ने कहा था कि बैठक में किसी का नाम नहीं सुझाया जाएगा, लेकिन कांग्रेस के उस भाग द्वारा एक साजिश के तहत ममता के जरिए उनका नाम सुझाया गया, भले ही खडग़े ने बाद में इसे अस्वीकार कर दिया। जदयू नेता त्यागी के इस बयान से लगता है कि नीतीश कुमार कांग्रेस की गतिविधियों से काफी नाराज थे और वेे अपनी नाराजगी का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ते हुए फिर से एनडीए में चले गए। दूसरी ओर भाजपा को लोकसभा चुनाव-2024 में बढ़त लेने के लिए नीतीश कुमार की जरूरत थी अन्यथा जातिगत गणना और लाखों लोगों को नौकरी मिलने का श्रेय महागठबंधन को मिलता तो बिहार में भाजपा का सुपड़ा साफ हो सकता था। इसके साथ ही बिहार का विकास मॉडल यूपी मॉडल और गुजरात मॉडल पर भारी पड़ता दिख रहा था, जिससे भाजपा काफी भयभीत थी। इसलिए वह बिहार मॉडल को धूलधूसरित करने के लिए नीतीश कुमार को मिला लिया ताकि इसका फायदा विपक्ष को न मिल सके, परंतु आम लोग के मन में यह बात घर कर गई है कि पिछले एक साल में बिहार ने विकास की जो नई इबारत लिखी है, उसका श्रेय नीतीश को नहीं, तेजस्वी को जाता है, क्योंकि पिछले एक साल में जो भी काम किया गया है, वह तेजस्वी के चुनावी वादों को पूरा करता दिख रहा है। अब देखना है कि चुनाव में इसका फायदा किसे मिलता है तेजस्वी को या भाजपा, जिसकी सच्चाई फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।
फिर एक नया अध्याय
