बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, राजनेता एवं जननायक कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित करने के घोषणा की है। स्व. ठाकुर स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ समाजसेवी भी थे जिनको बिहार की जनता याद करती है। वे 1970 तथा 1977 में दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे, किंतु वे अपना एक भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। पहले कार्यकाल में वे केवल 163 दिन तथा दूसरे कार्यकाल में लगभग दो साल तक सत्ता में रहे। इससे पहले वे एक बार उपमुख्यमंत्री के पद पर भी आसीन रहे। उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान बिहार के पिछड़े वर्ग के लिए 8 प्रतिशत तथा अतिपिछड़ा वर्ग के लिए 12 प्रतिशत आरक्षण लागू करवाया था। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना सही है कि कर्पूरी ठाकुर को मिला देश का सर्वोच्च सम्मान उनके त्याग का सम्मान है। बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौजिया कर्पूरी ग्राम में जन्मे कर्पूरी ठाकुर का आज बुधवार को शतवार्षिकी समारोह आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने गरीबों, पिछड़ों एवं दलितों के लिए काम किया। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।
उन्होंने मैट्रिक तक स्कूली शुल्क को माफ कर दिया था। राज्य के सभी विभागों में हिंदी के कामकाज को अनिवार्य बना दिया। गरीबों के हक की लड़ाई के लिए सबसे आगे रहे। बिहार में सर्वप्रथम शराबबंदी कर्पूरी ठाकुर के शासन में ही लागू की गई थी। यही कारण है कि वे बिहार में समाजवाद का चेहरा बन गए थे। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपने लिये कुछ भी नहीं किया। मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए भी अपनी कोई गाड़ी नहीं थी। इसके अलावा अपने पुश्तैनी घर को छोड़कर उनके पास शहर में कोई घर नहीं था। सामाजिक न्याय का अलख जगाने वाला यह जननायक भारत रत्न सम्मान का बहुत पहले से ही हकदार रहा है। कुछ पार्टियों ने राजनीति के लिए इनके नाम का इस्तेमाल जरूर किया, लेकिन इनके सर्वोच्च सम्मान के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। आपातकाल के दौरान इन्होंने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा शुरू किये गए आंदोलन में भाग लिया। वर्ष 1988 में उनका निधन हो गया, किंतु उनके द्वारा किये गए कामों को बिहार की जनता अभी भी याद करती है। ताजा जातिगत सर्वे के मुताबिक बिहार में पिछड़े एवं अतिपिछड़े वर्ग के लोगों की संख्या कुल आबादी का 52 प्रतिशत है।
आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस मुद्दे पर राजनीति होना स्वाभाविक है। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन की सरकार जातिगत सर्वे का मुद्दा बनाकर चुनावी लाभ लेने की कोशिश में है। वहीं केंद्र सरकार ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित कर महागठबंधन के मुद्दे पर जोरदार कुठाराघात किया है। सरकार के इस फैसले से आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को चुनावी लाभ मिल सकता है। भाजपा इस मुद्दे को पूरे देश में ले जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर को फोन करके बधाई दी है। बिहार के अति पिछड़े वर्ग में भाजपा के प्रति एक सकारात्मक संदेश गया है। अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को देश-विदेश में व्यापक रूप से पहुंचाने के बाद कर्पूरी ठाकुर को सर्वोच्च सम्मान देना भाजपा के लिए मास्टर स्ट्रोक हो सकता है। इसका जवाब फिलहाल विपक्षी दलों के पास नहीं है।